चांडिल डैम फिर 181.02 मीटर पर, 13 गेट से 2020 क्यूमेक्स पानी छोड़ा गया

खेतों में घुसा डैम का पानी, धान-सब्जियों पर संकट; विस्थापितों का सवाल—पहले चेतावनी क्यों नहीं, डूबे धान का मुआवजा कौन देगा?

चांडिल सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना का चांडिल डैम एक बार फिर 181 मीटर के खतरनाक स्तर को पार कर गया। शुक्रवार रात 9 बजे जलस्तर 181.02 मीटर आरएल दर्ज किया गया। दिनभर पानी छोड़े जाने के बावजूद जलाशय में पानी की आवक जारी रही, जिसके बाद रात में डिस्चार्ज बढ़ाकर 2020 क्यूमेक्स कर दिया गया।

विभागीय सूत्रों के अनुसार डैम के 13 रेडियल गेट खोले गए हैं। इनमें चार गेट 2.5 मीटर, पांच गेट 2 मीटर और चार गेट करीब 25 सेंटीमीटर तक खोले गए हैं। रात में डिस्चार्ज में अतिरिक्त 260 क्यूमेक्स की वृद्धि की गई।

जलस्तर 180 मीटर की सीमा पार करने के बाद ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के नीमडीह, कुकड़ू, चांडिल और ईचागढ़ प्रखंड के निचले इलाकों में पानी का दबाव बढ़ गया है। ग्रामीण क्षेत्रों के खेतों में पानी घुसने से खड़ी धान की फसल और सब्जियों को नुकसान की आशंका बढ़ गई है।

सूचना व्यवस्था पर उठे सवाल

डैम के बढ़ते जलस्तर के बीच सूचना व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। चांडिल प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो और विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने प्रशासन और विभाग की सूचना व्यवस्था पर सवाल उठाया है।

राकेश रंजन महतो का कहना है कि जिला प्रशासन खरकाई नदी और गांजिया बराज के जलस्तर की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक करता है, लेकिन चांडिल डैम के जलस्तर, गेट खोलने और डिस्चार्ज की नियमित जानकारी आम लोगों तक उसी तरह नहीं पहुंचती।

"कंप्यूटर रूम में बैठकर सिर्फ डेटा देखने से जमीनी हकीकत नहीं समझी जा सकती। तकनीकी डेटा के साथ ग्राउंड रिपोर्ट को जोड़ना जरूरी है। जलस्तर बढ़ने के बाद सूचना देने से ज्यादा जरूरी है कि बढ़ने से पहले चेतावनी दी जाए।" — राकेश रंजन महतो

"मैं खुद विस्थापित हूं, इसलिए दर्द समझता हूं"

चांडिल प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो ने कहा कि वे स्वयं विस्थापित परिवार से आते हैं और विस्थापितों की समस्या को नजदीक से समझते हैं। उनके अनुसार चांडिल डैम का निर्माण 1980-82 के आसपास शुरू हुआ था, लेकिन दशकों बाद भी विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

"बैठक में तय हुआ था कि पानी 180 मीटर आरएल से ऊपर नहीं जाएगा, लेकिन आज जलस्तर 181 मीटर पार कर गया। किसानों का धान, सब्जी और उपजाऊ जमीन डूब रही है। आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?" — रामकृष्ण महतो

प्रमुख ने कहा कि ग्रामीण जब अपनी समस्या लेकर विभाग के पास जाते हैं तो उन्हें यह कहकर जवाब दिया जाता है कि जमीन पहले ही अधिग्रहित हो चुकी है। उन्होंने सरकार से डूबे धान और अन्य फसलों के नुकसान का मुआवजा देने की मांग की है।

"बहुउद्देशीय परियोजना का लाभ विस्थापितों तक क्यों नहीं?"

रामकृष्ण महतो ने आरोप लगाया कि चांडिल परियोजना को बहुउद्देशीय परियोजना कहा जाता है, लेकिन उनके अनुसार इसका लाभ मुख्य रूप से टाटा, नीलांचल सहित औद्योगिक इकाइयों को पानी उपलब्ध कराने तक सीमित दिखाई देता है। उन्होंने आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगे जाने का दावा करते हुए कहा कि उन्हें अब तक जवाब नहीं मिला है।

अब राज्यपाल के दरबार में पहुंचेगा विस्थापितों का मुद्दा?

प्रमुख के अनुसार ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की टीम जल्द ही राज्यपाल से मुलाकात कर दशकों पुरानी विस्थापन समस्या को लेकर ज्ञापन सौंपने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि विस्थापितों के हक-अधिकार और किसानों की समस्याओं पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

चांडिल डैम का जलस्तर 181 मीटर पार करने और खेतों में पानी पहुंचने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है—प्रभावित गांवों को समय रहते कितनी जानकारी दी गई, और डूबे धान व बर्बाद हुई आजीविका का मुआवजा आखिर कौन देगा?