मरीन ड्राइव पर मौत की रात: चार बच्चे गए थे लौटने, चार घरों की गोद सूनी कर लौट आई मौत!
रात के ढाई-तीन बजे आखिर ये बच्चे कहां थे? सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, नशे, निगरानी और हमारी बदलती परवरिश का भी है
मरीन ड्राइव की वह रात सिर्फ एक सड़क दुर्घटना की कहानी नहीं है। यह उन तमाम सवालों की कहानी है, जिनसे समाज हर दिन आंखें चुराता है।
एक तरफ सड़क पर खराब हालत में खड़ा ट्रेलर था और दूसरी तरफ तेज रफ्तार कार। टक्कर इतनी भयावह थी कि कार ट्रेलर के पिछले हिस्से में जा घुसी और चार युवा जिंदगियां मौके पर ही खत्म हो गईं। मृतकों में झारखंड सरकार की ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की बेटी तृषा सिंह के साथ सार्थक अग्रवाल, नमन गुप्ता और वंशिका खंडेलवाल शामिल थे।


लेकिन हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कार की रफ्तार कितनी थी? सवाल यह भी है कि आधी रात के बाद ये बच्चे सड़क पर क्यों थे?
खबरों के अनुसार चारों छात्र रात में खाने के लिए निकले थे और लौटते समय यह हादसा हुआ। ट्रेलर रात करीब 10 बजे से खराब होकर सड़क पर खड़ा था और उसके पीछे पर्याप्त चेतावनी व्यवस्था थी या नहीं, इसकी भी जांच का सवाल सामने आया है।
लेकिन अब इस कहानी में नशीले पदार्थों की कथित बरामदगी और ट्रक मालिक की ओर से वाहन में नशे की वस्तु होने के कथित दावे की बात भी सामने आ रही है। यदि यह बात जांच में प्रमाणित होती है तो मामला सिर्फ सड़क हादसा नहीं रहेगा।


हमारे बच्चे नशे की तरफ आखिर क्यों जा रहे हैं?
क्या घरों में बच्चों से सिर्फ यह पूछा जाता है कि "पढ़ाई कैसी चल रही है?" या कभी यह भी पूछा जाता है—
- तुम्हारे दोस्त कौन हैं?
- कहां जा रहे हो?
- किसके साथ हो?
- रात में कितने बजे लौटोगे?
- तुम्हारी जिंदगी में चल क्या रहा है?
रात के तीन बजे सड़क पर कौन सा जन्मदिन मनाया जाता है? अगर बच्चों के पास पढ़ाई, दोस्ती और मनोरंजन के हजार रास्ते हैं, तो आधी रात के बाद तेज रफ्तार गाड़ी लेकर सड़क पर निकलने की जरूरत क्यों पड़ती है?
क्या माता-पिता को पता था कि उनके बच्चे उस रात कहां थे? अगर पता था तो क्या उन्हें यह सामान्य लगा? और अगर पता नहीं था तो फिर सवाल यह है कि बच्चे अपने घर में रहते हुए भी माता-पिता की निगरानी से इतने दूर कैसे हो गए?
यह सवाल हर उस घर से पूछा जाना चाहिए जहां मोबाइल की स्क्रीन पर बच्चे की जिंदगी खुली है, लेकिन माता-पिता को उसकी असली जिंदगी की खबर नहीं।
बच्चे नहीं समझ रहे या हम समझाना छोड़ चुके हैं?
आज नशा सिर्फ गली के नुक्कड़ तक सीमित नहीं है। यह स्कूल-कॉलेज के बच्चों तक पहुंचने की चर्चाओं के बीच खड़ा है। यहां सबसे बड़ा सवाल पुलिस से भी है— नशे की सप्लाई कहां से आती है? कौन बेचता है? कौन खरीदता है? कौन इन बच्चों तक पहुंचाता है?
अगर इस हादसे में नशीले पदार्थ की बरामदगी की बात सही निकलती है, तो पुलिस को सिर्फ दुर्घटना की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि युवाओं तक नशा पहुंचाने वाली कड़ी कहां से शुरू होती है।
चार बच्चे चले गए… लेकिन क्या हम अब भी नहीं जागेंगे?
तृषा, सार्थक, नमन और वंशिका अब वापस नहीं आएंगे। चार परिवारों के घर में अब वह आवाज नहीं गूंजेगी। किसी मां की गोद खाली हो गई, किसी पिता की उम्मीद टूट गई और किसी घर का भविष्य एक सड़क दुर्घटना में हमेशा के लिए खत्म हो गया।
क्या इस मौत के बाद भी हम सिर्फ दो दिन शोक मनाकर सब भूल जाएंगे?
जमीनी आवाज के पांच सीधे सवाल
- रात के करीब तीन बजे नाबालिग और युवा छात्र सड़क पर किस उद्देश्य से थे और उनकी गतिविधियों की जानकारी उनके परिवारों को थी या नहीं?
- अगर नशीली वस्तुओं की बरामदगी की बात सही है, तो वह कार तक कैसे पहुंची और उसका स्रोत क्या था?
- ट्रक मालिक या अन्य संबंधित व्यक्ति द्वारा नशे की वस्तुओं के संबंध में किया गया कोई दावा है तो पुलिस ने उसे जांच का हिस्सा बनाया है या नहीं?
- रात से खराब खड़े ट्रेलर के पीछे पर्याप्त रिफ्लेक्टर, चेतावनी संकेत और सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं थी?
- जमशेदपुर में युवाओं के बीच बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर पुलिस, प्रशासन, स्कूल-कॉलेज और अभिभावक मिलकर आखिर क्या ठोस कर रहे हैं?
यह खबर किसी एक परिवार पर उंगली उठाने के लिए नहीं है। यह हर मां-बाप के दरवाजे पर दस्तक है।
बच्चों को सिर्फ पढ़ाइए मत… उन्हें समझिए। उनके दोस्त जानिए। उनकी आदतें जानिए। उनकी परेशानी सुनिए। उनके मोबाइल से ज्यादा उनके मन को पढ़िए। क्योंकि कई बार बच्चा घर में बिल्कुल सामान्य दिखाई देता है… और बाहर उसकी जिंदगी किसी ऐसे रास्ते पर मुड़ चुकी होती है, जहां से लौटने का मौका नहीं मिलता।
मरीन ड्राइव की यह रात चार बच्चों को निगल गई। अब सवाल यह है— क्या यह मौत सिर्फ एक हादसा बनकर फाइल में बंद होगी, या जमशेदपुर के युवाओं को नशे और लापरवाही से बचाने की शुरुआत भी बनेगी?





