जमीनी आवाज | विशेष रिपोर्ट

घाटशिला, पूर्वी सिंहभूम, झारखंड | असित भट्टाचार्य की कलम से

डिग्रियां बांटने से नहीं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने से बनेगा भविष्य! कोल्हान विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर सक्रिय संवेदना ने उठाए सात गंभीर सवाल

पाठ्यक्रम पूरा कराने की जवाबदेही से लेकर शिक्षकों की नियुक्ति और रिक्त पदों तक पर उठाए सवाल; झारखंड के राज्यपाल से हस्तक्षेप कर उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग।

नामांकन बढ़े, लेकिन क्या शिक्षा की गुणवत्ता भी बढ़ी? स्थायी नियुक्तियों, नियमित पढ़ाई और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को लेकर उठाई आवाज।

विश्वविद्यालय की इमारतों से आगे, शिक्षा की बुनियाद पर उठे सवाल

उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को डिग्रियां देना नहीं, बल्कि उन्हें ज्ञान, कौशल, विवेक और आत्मनिर्भरता से लैस करना है। लेकिन जब विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम पूरा होने, नियमित पढ़ाई, शिक्षकों की उपलब्धता और नियुक्तियों की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगें, तो इनका जवाब तलाशना जरूरी हो जाता है। क्योंकि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली में दिखाई देने वाली खामियों का सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य, उनके परिवारों की उम्मीदों और समाज के विकास पर पड़ता है।

इसी गंभीर विषय को लेकर ‘सक्रिय संवेदना’ ने कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा से संबंधित विभिन्न समस्याओं को उठाते हुए झारखंड के राज्यपाल को एक विस्तृत आवेदन सौंपा है। 21 अक्टूबर 2026 को जारी पत्र में संगठन ने विश्वविद्यालय की स्थापना, पाठ्यक्रम संचालन, शिक्षकों की नियुक्ति, विद्यार्थियों की शैक्षणिक गतिविधियों और रिक्त पदों सहित सात प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान आकृष्ट कराया है।

आवेदन में उठाए गए सवाल केवल किसी एक विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। ये सवाल उस व्यापक जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करते हैं, जिसके केंद्र में विद्यार्थी और उनकी शिक्षा होनी चाहिए।

सात सवाल, जिनके जवाब विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े हैं

1. विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य और उसकी वर्तमान स्थिति

आवेदन के अनुसार, कोल्हान विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2009 में हुई थी। इसका उद्देश्य कोल्हान क्षेत्र के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना और क्षेत्र की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करना था।

सक्रिय संवेदना ने सवाल उठाया है कि क्या विश्वविद्यालय अपने स्थापना-उद्देश्यों के अनुरूप क्षेत्र की शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा कर पा रहा है? आवेदन में स्थानीय विषयों, भाषाओं, साहित्य, कला, संस्कृति और क्षेत्रीय इतिहास को पाठ्यक्रम तथा शोध से जोड़ने की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी विश्वविद्यालय की प्रासंगिकता केवल उसकी स्थापना से नहीं, बल्कि समाज और विद्यार्थियों के जीवन में उसके वास्तविक योगदान से तय होती है।

2. पाठ्यक्रम पूरा कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी?

आवेदन में पाठ्यक्रमों को समय पर पूरा कराने की जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। संगठन का कहना है कि यदि निर्धारित पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं होता, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है और उन्हें परीक्षा तथा आगे की शैक्षणिक तैयारियों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

सक्रिय संवेदना ने इस बात पर भी सवाल उठाया है कि पाठ्यक्रम पूरा कराने की जिम्मेदारी तय किए बिना शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना कैसे संभव होगा।

यहां मूल प्रश्न स्पष्ट है—यदि विद्यार्थी नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित होने के बावजूद पूरा पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते, तो इसकी जवाबदेही किस स्तर पर निर्धारित की जाएगी? क्या इसके लिए कोई प्रभावी निगरानी और मूल्यांकन व्यवस्था है?

3. अधूरे पाठ्यक्रम के बावजूद परीक्षा: विद्यार्थियों के साथ कितना न्याय?

आवेदन में आरोप लगाया गया है कि कई बार पाठ्यक्रम पूरा नहीं होने के बावजूद परीक्षाएं आयोजित कर ली जाती हैं। संगठन ने इस स्थिति में विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षणिक तैयारी और परीक्षा परिणामों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।

पत्र में निजी कोचिंग और ट्यूटोरियल संस्थानों पर विद्यार्थियों की निर्भरता बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है।

यदि विश्वविद्यालय की नियमित पढ़ाई विद्यार्थियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती, तो अतिरिक्त खर्च उठाकर निजी संस्थानों की मदद लेना उन परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है, जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी धीरे-धीरे विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर स्थानांतरित होती जा रही है? इस विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

4. शिक्षकों के अभाव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे संभव?

सक्रिय संवेदना ने आवेदन में शिक्षकों की कमी और शिक्षण व्यवस्था की स्थिति को भी प्रमुखता से उठाया है। संगठन का कहना है कि नियमित एवं प्रभावी शिक्षण के लिए पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता आवश्यक है।

जब शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी होती है, तो कक्षाओं का संचालन, पाठ्यक्रम पूरा करना और विद्यार्थियों की शैक्षणिक समस्याओं का समाधान प्रभावित हो सकता है।

इसलिए सवाल केवल शिक्षकों की संख्या का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता का भी है।

क्या विश्वविद्यालय के सभी संबंधित विभागों में शिक्षकों की उपलब्धता का नियमित आकलन किया जाता है? कितने पद स्वीकृत हैं, कितने पदों पर नियुक्तियां हुई हैं और कितने पद रिक्त हैं? इन सवालों पर पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

5. शिक्षा केवल परीक्षा और फीस तक सीमित नहीं हो सकती

आवेदन में यह भी कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। केवल परीक्षा आयोजित करना, फीस लेना और डिग्री प्रदान कर देना किसी शिक्षण संस्थान की पूरी जिम्मेदारी नहीं है।

विद्यार्थियों को शैक्षणिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण, रचनात्मक गतिविधियों, कौशल विकास और व्यक्तित्व निर्माण के अवसर भी मिलने चाहिए।

सक्रिय संवेदना ने इस दिशा में प्रभावी शैक्षणिक गतिविधियों और विद्यार्थियों के समग्र विकास की आवश्यकता पर जोर दिया है।

वास्तव में, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वही है जो विद्यार्थी को केवल परीक्षा पास करने के योग्य न बनाए, बल्कि उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार करे।

6. स्थायी नियुक्तियों और महत्वपूर्ण पदों को लेकर चिंता

आवेदन में विश्वविद्यालय के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों और नियुक्तियों की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें स्थायी प्रधानाचार्य, वित्तीय परामर्श, लेखा-वित्त, व्यावसायिक प्रशिक्षण और परीक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़े पदों का उल्लेख करते हुए व्यवस्था की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है।

संगठन ने आशंका जताई है कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए स्थायी व्यवस्था के स्थान पर अस्थायी प्रभार या नामित शिक्षकों पर निर्भरता से संस्थागत कामकाज प्रभावित हो सकता है।

हालांकि, इन पदों की वास्तविक स्थिति, स्वीकृत पदों की संख्या और वर्तमान नियुक्तियों की जानकारी संबंधित आधिकारिक अभिलेखों से सत्यापित किया जाना आवश्यक है।

फिर भी, सवाल महत्वपूर्ण है—क्या विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था को दीर्घकालिक आधार देने के लिए पर्याप्त संस्थागत कदम उठाए जा रहे हैं?

7. नामांकन बढ़ने के साथ संसाधन और शिक्षक भी बढ़ रहे हैं या नहीं?

सक्रिय संवेदना ने आवेदन में नामांकन और स्वीकृत पदों के बीच संतुलन का मुद्दा भी उठाया है। संगठन का कहना है कि यदि विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती है, लेकिन शिक्षकों और अन्य आवश्यक संसाधनों में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं होती, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ स्वीकृत पद लंबे समय से रिक्त हैं और नियुक्तियों की प्रक्रिया पर ध्यान देने की जरूरत है।

यहां विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने एक बुनियादी प्रश्न है—क्या उपलब्ध शिक्षक, कक्षाएं, प्रयोगशालाएं और अन्य शैक्षणिक संसाधन विद्यार्थियों की वर्तमान संख्या के अनुरूप हैं?

उच्च शिक्षा में विस्तार तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ संसाधनों, शिक्षकों और शैक्षणिक सुविधाओं का भी विकास हो।

राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग, अब जवाबदेही पर निगाहें

सक्रिय संवेदना ने अपने आवेदन में झारखंड के राज्यपाल से कोल्हान विश्वविद्यालय से संबंधित इन मुद्दों पर विचार करने और आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। पत्र में कहा गया है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार से क्षेत्र के विद्यार्थियों को बेहतर अवसर मिल सकते हैं और उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आवेदन पर राजभवन, उच्च शिक्षा विभाग और कोल्हान विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय की ओर से पाठ्यक्रम संचालन, शिक्षकों की उपलब्धता, रिक्त पदों और विद्यार्थियों को उपलब्ध सुविधाओं के संबंध में आधिकारिक स्थिति सामने आना भी जरूरी है।

जमीनी आवाज का सवाल: विद्यार्थी व्यवस्था के लिए हैं या व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए?

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी है। एक विद्यार्थी जब विश्वविद्यालय में प्रवेश लेता है, तो वह केवल एक डिग्री की उम्मीद लेकर नहीं आता। वह अपने परिवार के सपने, रोजगार की संभावना, आत्मनिर्भर बनने की आकांक्षा और बेहतर भविष्य का विश्वास लेकर आता है।

ऐसे में विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी केवल नामांकन लेने और परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थी नियमित पढ़ाई कर सकें, निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा हो, योग्य शिक्षक उपलब्ध हों और उन्हें अपने कौशल तथा प्रतिभा को विकसित करने के पर्याप्त अवसर मिलें।

सवाल किसी संस्था को बदनाम करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। और सवाल केवल कोल्हान विश्वविद्यालय का नहीं, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था का है, जिस पर झारखंड की नई पीढ़ी का भविष्य निर्भर करता है।

यदि आवेदन में उठाए गए सवालों में तथ्यात्मक आधार है, तो उनका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। यदि किसी बिंदु पर स्थिति अलग है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ अपना पक्ष सामने रखना चाहिए।

क्योंकि शिक्षा के मामले में चुप्पी समाधान नहीं है। पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार ही वह रास्ता है, जो विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित बना सकता है।

जमीनी आवाज की स्पष्ट बात: विश्वविद्यालय की सफलता केवल डिग्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि वहां से निकलने वाले विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल और भविष्य से मापी जानी चाहिए।

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