सरायकेला, 31 अक्टूबर।
चांडिल डैम विस्थापितों के पुनर्वास के नाम पर आवंटित करीब 13 करोड़ रुपये के भुगतान का मामला अब कागजी जांच के अगले चरण में पहुंच गया है। जल संसाधन विभाग की ओर से गठित पांच सदस्यीय जांच समिति ने पूछताछ और प्रारंभिक पड़ताल के बाद भुगतान से संबंधित महत्वपूर्ण फाइलें अपने साथ लेकर रांची पहुंचाई हैं। इन फाइलों में 180 से 183 RL तक प्रभावित गांवों के भुगतान का विवरण शामिल बताया जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रांची में होने वाली दस्तावेजी जांच से पुनर्वास भुगतान की पूरी प्रक्रिया की परतें खुलती हैं या नहीं।
सुवर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना के अंतर्गत विस्थापित परिवारों को पुनर्वास एवं अनुदान राशि देने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इसी सिलसिले में लगभग 10 गांवों के विस्थापितों के लिए करीब 13 करोड़ रुपये आवंटित किए जाने और वास्तविक पात्रता से इतर कुछ लोगों को भुगतान किए जाने के आरोप सामने आए हैं। जांच समिति द्वारा अलग-अलग गांवों की भुगतान फाइलों का अवलोकन किया जाना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
सबसे अहम सवाल यह है कि जिन परिवारों ने चांडिल डैम के कारण अपनी जमीन, घर और आजीविका गंवाई, क्या पुनर्वास की राशि वास्तव में उन्हीं तक पहुंची? यदि भुगतान किसी दूसरे गांव के अपात्र लाभुकों को हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? लाभुकों की पहचान किस आधार पर की गई और दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ? इन सवालों के जवाब अब जांच के दस्तावेजों में तलाशे जा रहे हैं।

हेवन गांव के भुगतान पर विशेष नजर, एक ही बैंक से भुगतान का आधार क्या?
इस पूरे प्रकरण में नीमडीह प्रखंड के हेवन गांव का भुगतान विशेष चर्चा में है। जांच के दौरान यह सवाल उठाया गया है कि कई लाभुकों को एक ही बैंक के माध्यम से भुगतान क्यों किया गया? क्या सभी लाभुकों के बैंक खातों और पहचान संबंधी दस्तावेजों का विधिवत सत्यापन हुआ था? क्या लाभुकों की पात्रता की जांच निर्धारित नियमों के अनुरूप की गई थी?
किसी एक बैंक से भुगतान होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि लाभुकों के चयन, दस्तावेजों के सत्यापन और भुगतान की स्वीकृति में नियमों की अनदेखी हुई है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जांच समिति के लिए जरूरी है कि वह केवल भुगतान की सूची देखकर संतुष्ट न हो, बल्कि प्रत्येक लाभुक की वास्तविक पात्रता और संबंधित दस्तावेजों का मिलान भी करे।
आम के पेड़ के नीचे कथित दलाली की चर्चा, अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
चांडिल डैम कार्यालय क्षेत्र में आम के पेड़ के नीचे बैठकर विस्थापितों के मामलों में कथित रूप से दलाली किए जाने की चर्चा भी सामने आई है। आरोप है कि कुछ बिचौलियों ने विस्थापितों के पुनर्वास और भुगतान संबंधी मामलों में प्रभाव स्थापित कर रखा था। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि उन विस्थापित परिवारों के अधिकारों के साथ गंभीर अन्याय का विषय है, जिन्होंने वर्षों तक अपने हक के लिए संघर्ष किया है।
इस प्रकरण में पुनर्वास कार्यालय संख्या-2, चांडिल तथा अपर निदेशक कार्यालय, आदित्यपुर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पुनर्वास पदाधिकारी से लेकर भुगतान प्रक्रिया में शामिल संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी की जांच आवश्यक है। कथित बिचौलियों की भूमिका और उनके माध्यम से हुए लेन-देन की भी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही हो सकेगी।
अब जांच केवल फाइलों तक सीमित न रहे, लाभुकों की जमीनी पहचान भी हो
जांच समिति के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है कि वह भुगतान से जुड़ी फाइलों, लाभुकों की सूची, बैंक विवरण, स्वीकृति आदेश और सत्यापन दस्तावेजों का आपस में मिलान करे। जरूरत पड़ने पर संबंधित लाभुकों से प्रत्यक्ष पूछताछ और गांव स्तर पर भौतिक सत्यापन भी किया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि भुगतान पाने वाले लोग वास्तव में परियोजना से प्रभावित विस्थापित परिवार हैं या नहीं।
विस्थापित संगठनों की मांग है कि 180 से 183 RL तक प्रभावित सभी गांवों की भुगतान प्रक्रिया की पारदर्शी जांच हो। जिन वास्तविक विस्थापित परिवारों को उनका अधिकार नहीं मिला है, उन्हें चिह्नित कर बकाया पुनर्वास अनुदान दिया जाए। वहीं, यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या बिचौलिए की संलिप्तता प्रमाणित होती है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए।
जमीनी आवाज का सवाल
चांडिल डैम के विस्थापितों ने विकास परियोजना के लिए अपनी जमीन और घर छोड़े थे। पुनर्वास राशि कोई सरकारी मेहरबानी नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों का अधिकार है। ऐसे में करीब 13 करोड़ रुपये के भुगतान पर उठे सवालों को सामान्य प्रशासनिक गड़बड़ी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि फाइलें रांची पहुंच गईं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या जांच समिति उन फाइलों के पीछे छिपे सच तक पहुंचेगी? क्या हेवन गांव के भुगतान से लेकर अन्य प्रभावित गांवों के लाभुकों की पात्रता तक हर पहलू की जांच होगी? और यदि सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो क्या जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी होगी?
विस्थापितों को एक और जांच का आश्वासन नहीं, अपने अधिकार का हिसाब चाहिए। रांची पहुंची फाइलों से यदि सच सामने नहीं आया तो फिर सवाल उठेगा कि आखिर इस जांच का मकसद जवाबदेही तय करना है या एक बार फिर मामले को सरकारी कागजों में उलझा देना?
जमीनी आवाज इस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों, भुगतान संबंधी अभिलेखों और प्रभावित परिवारों के प्रमाणों के आधार पर आगे भी पड़ताल जारी रखेगा।
रिपोर्ट: विजय कुमार गोपे