जमीनी आवाज | विशेष पड़ताल

सरायकेला, 31 अक्टूबर।

चांडिल डैम यानी सुवर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना के विस्थापन का दर्द दशकों पुराना है, लेकिन पुनर्वास और विकास के नाम पर उठ रहे सवाल आज भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहे। जिन 116 गांवों के लोगों ने परियोजना के लिए अपनी जमीन, घर और आजीविका गंवाई, उन्हीं प्रभावित परिवारों के बीच अब विकास योजनाओं, मुआवजा भुगतान और पुनर्वास कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर असंतोष सामने आया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि विस्थापितों को उनका अधिकार मिला या नहीं, बल्कि यह भी है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज अधिकारों और वास्तविक लाभुकों के बीच कहीं कोई बड़ा अंतर तो नहीं है?

शुक्रवार को जल संसाधन विभाग, झारखंड सरकार द्वारा गठित पांच सदस्यीय जांच समिति के समक्ष गोल्डन व्यू रिसोर्ट, आईबी डैम कॉलोनी, घोड़ानेगी में हुई सुनवाई के दौरान विस्थापितों ने एक के बाद एक ऐसे सवाल उठाए, जिनका जवाब अब सरकारी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।

जांच समिति की अध्यक्ष एवं जल संसाधन विभाग की अपर सचिव आर. रॉनिटा के समक्ष जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो, विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के राकेश रंजन महतो तथा विस्थापित मुक्ति वाहिनी के अंबिका यादव ने पुनर्वास व्यवस्था, कथित वित्तीय अनियमितताओं और विस्थापितों के लंबित अधिकारों से जुड़े मुद्दे रखे।

116 गांव प्रभावित, फिर विकास का लाभ सिर्फ 43 गांवों तक क्यों?

सुनवाई में सबसे बड़ा सवाल परियोजना से प्रभावित गांवों के विकास को लेकर उठा। जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो ने सवाल किया कि जब चांडिल डैम परियोजना से कुल 116 गांव प्रभावित हुए हैं, तो विकास योजनाओं का लाभ केवल 43 गांवों तक ही क्यों सीमित है? बाकी प्रभावित गांवों को विकास की मुख्यधारा से बाहर रखने का आधार क्या है?

चार वर्षों से विकास कार्य ठप रहने और कई आंशिक प्रभावित गांवों को विकास पुस्तिका तक नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया गया। सवाल यह है कि परियोजना के लिए जिन गांवों ने अपनी जमीन और संसाधनों का त्याग किया, क्या उन्हें विकास के अधिकार से अलग रखा जा सकता है?

पुनर्वास की जमीन का रिकॉर्ड अब तक दुरुस्त क्यों नहीं?

पुनर्वास के लिए अधिग्रहित जमीन को संबंधित विभाग के नाम विधिवत हस्तांतरित नहीं किए जाने तथा अंचल के पंजी-2 में समुचित संधारण नहीं होने का मामला भी सामने आया। वर्षों पहले विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जमीन अधिग्रहण हुआ, लेकिन यदि आज भी उसके कानूनी रिकॉर्ड अधूरे हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी है?

विस्थापितों को पुनर्वास भूमि का विधिवत पट्टा देने की मांग भी जांच समिति के सामने रखी गई।

डैम का पानी किसानों की तैयार फसल पर भारी!

पुनर्वास का संकट केवल घर और जमीन तक सीमित नहीं है। कुकड़ू प्रखंड की सभी नौ पंचायतों के प्रभावित होने का मुद्दा उठाते हुए बताया गया कि अनावश्यक जल भंडारण के कारण दयापुर, कुमारी, झापागोड़ा, उदाटांड़, बांदाबीर, केंदुआंदा, चौका, आदारडीह और चानो सहित कई गांवों के पके धान के खेतों में पानी घुस गया है।

एक तरफ विस्थापन का पुराना दर्द और दूसरी तरफ तैयार फसल पर डैम के पानी का संकट। ऐसे में किसानों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? मधुश्री महतो ने मांग की कि लंबित अनुदान राशि का भुगतान होने तक डैम का जलस्तर 179 RL से नीचे रखा जाए, ताकि किसानों और ग्रामीणों को अतिरिक्त नुकसान से बचाया जा सके।

उन्होंने वर्ष 2026 तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले पात्र विस्थापितों की विकास पुस्तिका बनाने, धारा-4 की प्रक्रिया में एकरूपता लाने तथा भुगतान का सत्यापन स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विस्थापित संगठनों की उपस्थिति में कराने की मांग भी रखी।

13 करोड़ से अधिक की कथित गड़बड़ी, भुगतान अभिलेखों की जांच के घेरे में

सुनवाई का सबसे गंभीर मुद्दा RL-180 से 183 मीटर तक के प्रभावित गांवों की पुनर्वास राशि से जुड़ा रहा। विस्थापित मुक्ति वाहिनी के अंबिका यादव ने आरोप लगाया कि RL-180 मीटर से ऊपर के 10 गांवों के लिए निर्धारित पुनर्वास राशि दूसरे गांवों के अपात्र व्यक्तियों को भुगतान कर दी गई। इस कथित अनियमितता में 13 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का मामला बताया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच समिति RL-180 से 183 मीटर तक के प्रभावित गांवों के भुगतान अभिलेख अपने साथ रांची ले गई। विशेष रूप से नीमडीह प्रखंड के हेवेन गांव में हुए भुगतान को लेकर सवाल उठाए गए।

सुनवाई के दौरान मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान किए जाने की शिकायत भी सामने आई। यदि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर सरकारी राशि जारी हुई है, तो उसके पीछे की पूरी प्रक्रिया की जांच जरूरी है। संबंधित व्यक्ति की मृत्यु कब हुई थी? भुगतान आदेश किस आधार पर जारी हुआ? सत्यापन किसने किया? राशि किस बैंक खाते में पहुंची और उसकी वास्तविक निकासी किसने की?

ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब केवल भुगतान सूची नहीं, बल्कि मूल अभिलेख, बैंक विवरण और निकासी रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आ सकता है।

मास्टर कार्ड आखिर किसके कब्जे में है?

पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए विस्थापित संगठनों ने मास्टर कार्ड को सार्वजनिक जांच के दायरे में लाने की मांग की। संगठनों का सवाल है कि मास्टर कार्ड में दर्ज वास्तविक प्रभावित परिवारों, पात्र सदस्यों और भुगतान संबंधी विवरणों की पारदर्शी जांच क्यों नहीं हो रही?

क्या मास्टर कार्ड और विकास पुस्तिकाओं में दर्ज नामों का आपस में मिलान किया गया है? क्या किसी अपात्र व्यक्ति को पात्र दिखाकर विकास पुस्तिका जारी की गई? क्या भुगतान सूची में दर्ज लाभुक वास्तव में परियोजना से प्रभावित परिवारों के सदस्य हैं?

संगठनों ने मांग की कि हेवेन गांव सहित RL-180 से 183 मीटर तक के सभी प्रभावित गांवों के मास्टर कार्ड, विकास पुस्तिकाओं और भुगतान अभिलेखों का मिलान कराया जाए। यदि रिकॉर्ड सही हैं तो उन्हें जांच के लिए उपलब्ध कराने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।

एक ही बैंक में बड़ी संख्या में खाते खुलवाने का आधार क्या था?

भुगतान व्यवस्था को लेकर एक और गंभीर सवाल उठाया गया। विस्थापित संगठनों ने पूछा कि जब प्रभावित परिवार अलग-अलग गांवों और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं, तो बड़ी संख्या में लाभुकों के खाते एक ही बैंक में क्यों खुलवाए गए?

क्या लाभुकों को अपनी पसंद के बैंक में खाता खोलने की स्वतंत्रता थी? एक ही बैंक को प्राथमिकता देने का आधार क्या था? क्या सभी भुगतान वास्तविक लाभुकों के खातों में ही पहुंचे? कहीं किसी अन्य माध्यम से राशि की निकासी तो नहीं हुई?

संगठनों ने बैंक खातों, भुगतान आदेशों और निकासी अभिलेखों का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की है। हालांकि, इन सवालों के आधार पर किसी बैंक कर्मचारी या अधिकारी की संलिप्तता अभी स्थापित नहीं होती। इसकी पुष्टि जांच और दस्तावेजी मिलान से ही हो सकती है।

पुनर्वास कार्यालय में कथित बिचौलियों का प्रभाव किसके संरक्षण में?

विस्थापितों ने जमीन अधिग्रहण, मुआवजा और विकास पुस्तिका से संबंधित कार्यों में कथित बिचौलियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। आरोप है कि कुछ मामलों में विस्थापितों को अपने ही अधिकारों से जुड़े काम कराने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है।

सवाल यह है कि यदि पुनर्वास कार्यालय की व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो सरकारी कार्यालय के आसपास कथित दलालों की भूमिका की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? क्या विस्थापितों के दस्तावेजों और भुगतान प्रक्रिया में बाहरी लोगों का हस्तक्षेप होता है? क्या किसी की विकास पुस्तिका से राशि निकाले जाने में बिचौलियों की भूमिका रही है?

इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और कार्यालय की कार्यप्रणाली की समीक्षा जरूरी है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि विस्थापितों को अपने काम के लिए किसी मध्यस्थ पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है।

रोजगार, बाजार और पर्यटन विकास की मांग भी उठी

सुनवाई में विस्थापित संगठनों ने केवल कथित अनियमितताओं की जांच की मांग नहीं की, बल्कि क्षेत्र के भविष्य से जुड़े कई प्रस्ताव भी रखे। इनमें सभी पात्र विस्थापितों की विकास पुस्तिका बनाने और लंबित भुगतान सुनिश्चित करने, विकास योजनाओं में RL की बाध्यता समाप्त कर वास्तविक जरूरत के आधार पर योजनाएं स्वीकृत करने तथा परियोजना और परियोजना का पानी लेने वाली कंपनियों में स्थानीय विस्थापित युवाओं को सीधी नियुक्ति में प्राथमिकता देने की मांग शामिल रही।

इसके अलावा मुखिया होटल से अनुमंडल कार्यालय तक व्यवस्थित मार्केट प्लेस विकसित कर दुकानें वास्तविक विस्थापितों को आवंटित करने तथा रसुनिया, दुलमी और पातकुम में नौका विहार एवं पर्यटन सुविधाओं का विकास करने का प्रस्ताव भी रखा गया।

अब जांच समिति के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी

विस्थापित संगठनों ने मांग की कि RL-180 से 183 मीटर तक के सभी प्रभावित गांवों के मास्टर कार्ड, विकास पुस्तिका, लाभुक सूची, भुगतान आदेश, बैंक खाता विवरण और निकासी अभिलेखों का आपस में मिलान किया जाए। मृत व्यक्तियों के नाम पर भुगतान, अपात्र लाभुकों और गलत भुगतान की शिकायतों की अलग-अलग जांच हो तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

पांच सदस्यीय जांच समिति में अध्यक्ष आर. रॉनिटा, अपर सचिव; अजय सिंह बड़ाईक, संयुक्त सचिव; कुमार अरविन्द, अधीक्षण अभियंता; ओंकार नाथ, अधीक्षण अभियंता तथा प्रभाष कुमार दत्ता, उप सचिव शामिल हैं। मौके पर अपर निदेशक गौतम कुमार भगत एवं आरओ सुखदेव महतो भी उपस्थित थे।

जमीनी आवाज का सवाल

चांडिल डैम ने विकास और सिंचाई की उम्मीदों के साथ हजारों परिवारों से उनकी जमीन और पुश्तैनी पहचान छीनी। लेकिन जिन परिवारों ने परियोजना के लिए अपना सब कुछ गंवाया, उन्हें आज भी विकास पुस्तिका, मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास के लिए सवाल उठाने पड़ रहे हैं।

अब जब पांच सदस्यीय जांच समिति भुगतान से जुड़े महत्वपूर्ण अभिलेख रांची ले गई है, तो जांच का दायरा केवल 13 करोड़ रुपये की कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। 116 प्रभावित गांवों के पुनर्वास, विकास और भुगतान व्यवस्था का समग्र ऑडिट होना चाहिए।

आखिर जिनके नाम पर पुनर्वास का पैसा आया, क्या वह पैसा उन्हीं तक पहुंचा? और यदि नहीं, तो इस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?

जमीनी आवाज इस मामले से जुड़े दस्तावेजों, जांच के निष्कर्षों और विस्थापित परिवारों के अधिकारों पर आगे भी नजर बनाए रखेगा।

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रिपोर्ट: विजय कुमार गोपे