सरायकेला-खरसावां, 31 अक्टूबर।
झारखंड की मिट्टी में रची-बसी लोकसंस्कृति जब मंच पर उतरती है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि अपनी परंपरा, इतिहास और पहचान का एहसास भी कराती है। कुछ ऐसा ही नजारा नीमडीह प्रखंड के केतुंगा स्कूल मैदान में देखने को मिल रहा है, जहां शुक्रवार को तीन दिवसीय 'झारखंड लिविंग हेरिटेज फेस्टिवल 2026' का रंगारंग शुभारंभ हुआ। छऊ नृत्य की दमदार थाप, बाउल संगीत की मधुर तान, कठपुतली कला और पारंपरिक हस्तशिल्प के संगम ने इस आयोजन को लोकसंस्कृति के एक बड़े उत्सव का रूप दे दिया है।
30 अक्टूबर से 1 नवंबर तक चलने वाले इस महोत्सव में झारखंड की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई है। यहां केवल कलाकारों की प्रस्तुतियां ही आकर्षण नहीं हैं, बल्कि उन ग्रामीण कारीगरों का हुनर भी सामने आ रहा है, जिनकी कला पीढ़ियों से गांवों में जीवित है।
महोत्सव का उद्घाटन मुख्य अतिथि नीमडीह के प्रखंड विकास पदाधिकारी कुमार एस अभिनव ने पौधे में पानी डालकर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान करते हैं। इससे ग्रामीण लोककलाओं को व्यापक पहचान मिलती है और कलाकारों के लिए आजीविका के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।

2600 से अधिक कलाकारों और शिल्पकारों की प्रतिभा को मंच
इस महोत्सव का आयोजन कॉन्टैक्ट बेस और बांग्लानाटक डॉट कॉम की ओर से एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है। यह 'रूट्स टू प्रॉस्पेरिटी: बिल्डिंग सस्टेनेबल लाइवलीहुड्स थ्रू हेरिटेज' पहल का हिस्सा है। इसके तहत सरायकेला-खरसावां जिले में 2600 से अधिक पारंपरिक कलाकारों और शिल्पकारों के साथ काम किया जा रहा है।
इनमें सरायकेला, खरसावां, मानभूम और मयूरभंज छऊ से जुड़े कलाकारों के अलावा बांस शिल्पकार, काशी घास और साल के पत्तों से कलाकृतियां बनाने वाले कारीगर भी शामिल हैं। आयोजन से जुड़ी अभिप्सा घोष के अनुसार, महोत्सव में छऊ नृत्य की विभिन्न शैलियों के साथ बाउल संगीत और कठपुतली कला की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण रहेंगी।
उद्घाटन दिवस पर मां भार्गोबी छऊ दल ने गुरु विजय कुमार साहू के नेतृत्व में सरायकेला छऊ नृत्य की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। इसके बाद उस्ताद परेश कुमार के नेतृत्व में पुरुलिया छऊ डांस अकादमी के कलाकारों ने मानभूम छऊ की प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दोनों प्रस्तुतियों ने झारखंड और आसपास के क्षेत्रों की समृद्ध नृत्य परंपरा की खूबसूरती को सामने रखा।
अगले दो दिनों तक भी जारी रहेगा लोककलाओं का सिलसिला
महोत्सव के दूसरे दिन 31 अक्टूबर को रंजन राय एवं समूह द्वारा कठपुतली कला की प्रस्तुति दी जाएगी। इसके साथ नंदलाल कुम्हार के नेतृत्व में खरसावां छऊ तथा कार्तिक कर्मकार के नेतृत्व में मानभूम छऊ के कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।
वहीं, 1 नवंबर को बाउल संगीत के साथ मयूरभंज और मानभूम छऊ की प्रस्तुतियां होंगी। इस तरह तीन दिनों तक केतुंगा का मैदान अलग-अलग लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक रंगों से गुलजार रहेगा।
हस्तशिल्प में दिखेगा गांवों का हुनर
इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय हस्तशिल्प और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देना भी है। केतुंगा, राजागोरा, भांगाट, तेंतलो और चिरुगोरा के स्थानीय कलाकार बांस की टोकरियां, काशी घास से तैयार शिल्प और क्रोशिया कला की प्रदर्शनी लगा रहे हैं।
दरअसल, लोकसंस्कृति का संरक्षण तभी सार्थक होगा, जब उससे जुड़े कलाकारों और कारीगरों को सम्मान के साथ आर्थिक अवसर भी मिलें। गांवों में तैयार होने वाली इन पारंपरिक कलाकृतियों को बाजार और पहचान मिले, तो यह हुनर नई पीढ़ी के लिए भी रोजगार का माध्यम बन सकता है।
केतुंगा में आयोजित यह महोत्सव इसी दिशा में एक प्रयास है। यहां छऊ की थाप के साथ बाउल की तान तो सुनाई दे ही रही है, साथ ही उन हाथों की मेहनत भी दिखाई दे रही है, जो बिना किसी बड़े संसाधन के अपनी परंपराओं को आज तक जीवित रखे हुए हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसे आयोजनों की चमक मंच तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामीण कलाकारों के जीवन और उनकी आजीविका में भी स्थायी बदलाव लेकर आए।
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रिपोर्ट: विजय कुमार गोपे