असित भट्टाचार्य | जमीनी आवाज
7.8% जीडीपी का ढोल पीटने वालों! पोल्टू की थाली में भी झांकिए, विकास का उजाला गरीब तक कब पहुंचेगा?
उपशीर्षक 1: त्योहार के दिन भी घरों के बजट पर महंगाई की मार, मेहनतकश की जिंदगी में राहत का इंतजार!
उपशीर्षक 2: दोपहर के 12 बजे, कड़ी धूप में पसीने से तरबतर पोल्टू चाय वाले बर्तन धो रहा है। सवाल है—आर्थिक विकास की चमक उसकी जिंदगी तक कब पहुंचेगी?

आश्चर्य! सचमुच आश्चर्य!
कल तक 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि का ढोल पीटकर देश को आर्थिक विकास की कहानी सुनाई जा रही थी। आंकड़ों की चमक दिखाई जा रही थी और उपलब्धियों का बखान हो रहा था। लेकिन आज सवाल उठता है कि उस विकास की रोशनी आखिर किसके घर तक पहुंची? किसके चूल्हे पर खुशहाली की रोटी सेंकी गई? किस गरीब परिवार के चेहरे पर महंगाई से राहत की मुस्कान आई?
प्रधानमंत्री जी, आर्थिक विकास के आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन आम आदमी की जिंदगी का हिसाब कौन देगा?
त्योहार की रौनक और गरीब की जेब का हिसाब
दुर्गापूजा का त्योहार है। घरों में मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियां हो रही हैं। कहीं मिठाई खरीदी जा रही है, कहीं बच्चों के लिए नए कपड़ों का इंतजाम हो रहा है, तो कहीं घर की महिलाएं सीमित पैसों में पूरे परिवार की खुशियां समेटने की कोशिश कर रही हैं।
लेकिन हर घर की कहानी एक जैसी नहीं है।
किसी घर में त्योहार का मतलब पकवान है, तो किसी घर में यह चिंता कि महीने का राशन कैसे चलेगा। किसी के लिए पूजा बाजार की रौनक है, तो किसी के लिए बच्चों की छोटी-सी इच्छा पूरी न कर पाने का दर्द।
चेहरों पर त्योहार की चमक होनी चाहिए, लेकिन कितने चेहरों पर आर्थिक चिंता की शिकन है, यह जानने के लिए किसी बड़े सर्वेक्षण की नहीं, बाजार की गलियों में उतरकर लोगों की जिंदगी देखने की जरूरत है।

दोपहर 12 बजे की वह तस्वीर, जिसे आंकड़े नहीं बताते!
आइए, जरा उस तस्वीर को देखिए, जिसे आर्थिक विकास के बड़े-बड़े भाषणों में शायद ही जगह मिलती है।
कड़ी धूप है। सड़क तप रही है। पसीना लगातार बह रहा है। और पोल्टू चाय वाला बर्तन धो रहा है।
त्योहार का दिन है, लेकिन उसके हाथों को छुट्टी नहीं मिली। धूप से बचने का वक्त नहीं मिला। पसीना पोंछकर चैन से बैठने का अवसर नहीं मिला। क्योंकि उसके लिए त्योहार से पहले रोजी-रोटी का सवाल खड़ा है।
चाय की दुकान पर आने वाले लोग देश की राजनीति पर बहस कर सकते हैं। जीडीपी पर चर्चा कर सकते हैं। सरकार की उपलब्धियां गिना सकते हैं। लेकिन पोल्टू के लिए दिन का सबसे जरूरी सवाल शायद यही है—आज कितनी बिक्री होगी? दुकान का खर्च निकलेगा या नहीं? घर लौटते समय बच्चों के लिए कुछ ले जा पाएगा या नहीं?
यही है विकास की असली परीक्षा!
जीडीपी बढ़ना अच्छी बात, लेकिन आम आदमी की जिंदगी भी सुधरे!
देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो यह अच्छी बात है। भारत की तरक्की हर नागरिक की आकांक्षा है। लेकिन विकास का अर्थ केवल आंकड़ों का ऊपर जाना नहीं हो सकता।
विकास का अर्थ यह भी है कि गरीब की थाली में भोजन हो, मेहनतकश को उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले, परिवार इलाज के खर्च से न टूटे और त्योहार के दिन किसी पिता को बच्चों की छोटी-सी इच्छा के सामने बेबस न होना पड़े।
सवाल जीडीपी से नफरत का नहीं है। सवाल यह है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ आम आदमी तक कितना पहुंच रहा है और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदलाव ला रहा है।

प्रधानमंत्री जी, देश के बाजार से भी पूछिए!
प्रधानमंत्री जी, आपके सामने अर्थव्यवस्था के आंकड़े आते होंगे। विशेषज्ञ विकास दर का विश्लेषण करते होंगे। सरकार अपनी उपलब्धियों का हिसाब रखती होगी। लेकिन क्या उस दुकानदार की परेशानी भी सुनी जाती है, जिसकी बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रही?
क्या उस दिहाड़ी मजदूर की चिंता पर ध्यान दिया जाता है, जिसे एक दिन काम नहीं मिला तो घर का बजट बिगड़ जाता है?
क्या उस मां की परेशानी पर भी चर्चा होती है, जो बाजार में सामान के दाम पूछकर बिना खरीदे लौट आती है?
और क्या उस पोल्टू की थकान भी विकास की तस्वीर में दिखाई देती है, जो त्योहार के दिन भी कड़ी धूप में बर्तन धो रहा है?
देश को केवल यह जानने का अधिकार नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ी। देश यह भी जानना चाहता है कि उस बढ़ोतरी से उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदला।
महंगाई, रोजगार, आमदनी, बचत और जरूरी सेवाओं का खर्च—ये वे सवाल हैं, जिनसे करोड़ों परिवारों की जिंदगी का वास्तविक हिसाब बनता है। आंकड़े आर्थिक स्थिति की तस्वीर का एक हिस्सा बताते हैं, लेकिन आम आदमी का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
देश चलाने का हिसाब केवल बड़े आंकड़ों से नहीं मिलता!
प्रधानमंत्री जी, देश कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहां केवल कारोबार बढ़ जाने से सफलता घोषित कर दी जाए।
देश करोड़ों लोगों की उम्मीदों से बनता है। यहां किसान की फसल, मजदूर का पसीना, छोटे दुकानदार की कमाई, नौकरीपेशा परिवार की बचत और गरीब के घर का चूल्हा—सबकी अपनी अहमियत है।
व्यापार में भी कुल कारोबार बढ़ने से हर कर्मचारी की आमदनी बढ़ना तय नहीं हो जाता। उसी तरह अर्थव्यवस्था की वृद्धि अपने आप यह साबित नहीं करती कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर गई है।
इसलिए सवाल पूछना जरूरी है।
यदि विकास हुआ है, तो रोजगार की गुणवत्ता में कितना सुधार आया? यदि अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है, तो आम परिवार की बचत पर क्या असर पड़ा? यदि देश आगे बढ़ रहा है, तो छोटे दुकानदार और मेहनतकश की जिंदगी में राहत कितनी बढ़ी?
और यदि सरकार अपनी आर्थिक उपलब्धियों पर गर्व कर रही है, तो उसे उन लोगों की परेशानियों का जवाब भी देना चाहिए, जिनके श्रम से देश की अर्थव्यवस्था चलती है।
यह सवाल किसी एक पार्टी का नहीं है। यह सवाल सत्ता की जवाबदेही का है। सरकार कोई भी हो, प्रधानमंत्री कोई भी हो—जनता को यह पूछने का अधिकार है कि विकास की मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते आम आदमी पीछे क्यों छूट जाता है।

देश की आर्थिक तरक्की में आम आदमी का हिस्सा कितना है?
राजनीति में अक्सर देश की प्रतिष्ठा, राष्ट्रवाद और आर्थिक ताकत की चर्चा होती है। लेकिन राष्ट्र की ताकत का एक चेहरा वह भी है, जो सुबह दुकान खोलता है, खेत में पसीना बहाता है, निर्माण स्थल पर ईंट उठाता है और दूसरों की सुविधा के लिए अपनी छुट्टी तक छोड़ देता है।
देश को बेचने या बचाने जैसे बड़े आरोप लगाने से पहले नीतियों, फैसलों और उनके वास्तविक प्रभाव का हिसाब देखना जरूरी है। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि देश की संपत्ति, सार्वजनिक संसाधनों और आर्थिक नीतियों से मिलने वाले लाभ में आम नागरिक की हिस्सेदारी कितनी है।
क्या आर्थिक फैसलों का लाभ व्यापक समाज तक पहुंच रहा है? क्या छोटे कारोबारियों को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं? क्या मेहनत करने वाले लोगों की आय और जीवन की सुरक्षा बेहतर हो रही है?
देश की संपत्ति का सवाल केवल राजनीतिक नारे का विषय नहीं होना चाहिए। इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
भारत केवल बड़ी कंपनियों, बड़े कारोबारियों और बड़े आर्थिक आंकड़ों का नाम नहीं है। भारत पोल्टू भी है। भारत खेतों में काम करने वाला किसान भी है। भारत वह महिला भी है, जो सीमित पैसों में पूरे परिवार का घर चलाती है। भारत वह नौजवान भी है, जो रोजगार की तलाश में भटकता है।
इन लोगों की जिंदगी बेहतर नहीं हुई, तो विकास की कहानी अधूरी ही मानी जाएगी।

त्योहार की असली खुशी कब लौटेगी?
दुर्गापूजा का त्योहार हमें शक्ति, न्याय और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। ऐसे अवसर पर हमें अपने समाज और शासन की प्राथमिकताओं पर भी विचार करना चाहिए।
क्या त्योहार की खुशी केवल रोशनी, सजावट और बाजार की रौनक से तय होगी? या इस बात से भी कि गरीब परिवार बिना कर्ज लिए अपने बच्चों के साथ त्योहार मना सके?
क्या विकास का उत्सव केवल भाषणों और आंकड़ों में मनाया जाएगा? या उस मजदूर के घर तक भी पहुंचेगा, जिसने पूरे साल मेहनत की है?
क्या सरकार की सफलता केवल आर्थिक वृद्धि के प्रतिशत से मापी जाएगी? या इस बात से भी कि एक आम आदमी बीमारी, बेरोजगारी और महंगाई के डर से कितना मुक्त हुआ?
प्रधानमंत्री जी, इन सवालों के जवाब देश की जनता को चाहिए। जवाब उस परिवार को चाहिए, जो त्योहार का खर्च जुटाने के लिए अपनी जरूरतें टाल रहा है। जवाब उस छोटे दुकानदार को चाहिए, जो हर सुबह उम्मीद लेकर दुकान खोलता है।
और जवाब पोल्टू को भी चाहिए।
वह पोल्टू, जो दोपहर की कड़ी धूप में पसीने से तरबतर बर्तन धो रहा है। जिसकी मेहनत से दूसरों की चाय की प्यालियां साफ रहती हैं, लेकिन जिसकी अपनी जिंदगी की परेशानियां अब भी राहत का इंतजार कर रही हैं।
प्रधानमंत्री जी, 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि का आंकड़ा देश की आर्थिक तस्वीर का एक हिस्सा हो सकता है। लेकिन पोल्टू के घर का चूल्हा, उसकी कमाई और उसके बच्चों की मुस्कान भी भारत की तस्वीर का हिस्सा हैं।
आंकड़ों का उत्सव मनाइए, उपलब्धियों का जश्न मनाइए, देश की तरक्की पर गर्व कीजिए—लेकिन उस आदमी को मत भूलिए, जिसके पसीने से यह देश चलता है।
जिस दिन पोल्टू भी अपने परिवार के साथ बिना आर्थिक चिंता के त्योहार मना सकेगा, जिस दिन मेहनतकश को अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा और जिस दिन गरीब परिवार के लिए जरूरी जरूरतें पूरी करना संघर्ष नहीं रहेगा, उस दिन विकास की कहानी आम आदमी की जिंदगी में भी दिखाई देगी।
सत्ता को आईना दिखाना विरोध नहीं, लोकतंत्र में जनता का अधिकार है।
और जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—
प्रधानमंत्री जी, देश की जीडीपी बढ़ने का जश्न अपनी जगह, लेकिन पोल्टू के घर की आर्थिक स्थिति कब सुधरेगी? आखिर विकास का उजाला उस गरीब की झोपड़ी तक कब पहुंचेगा, जो आज भी त्योहार के दिन कड़ी धूप में बर्तन धोकर अपना चूल्हा जलाने की कोशिश कर रहा है?
चाय ठंडी हो सकती है, लेकिन जनता के सवाल नहीं।
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