असित भट्टाचार्य की कलम से
आंखें दान कर जाइए, शायद अगली सदी में विकास दिखाई दे!
स्मार्ट सिटी से बुलेट ट्रेन तक सपनों की रफ्तार तेज है, बस आम आदमी की जिंदगी में विकास की मंजिल का इंतजार बाकी है!
कहते हैं, व्यंग्य वहीं जन्म लेता है, जहां सवालों के जवाब कम पड़ने लगते हैं और दावों की ऊंचाई जमीन की सच्चाई से बहुत आगे निकल जाती है।
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक तंज चर्चा में है—“अंधभक्तों, नेत्रदान अवश्य करो, ताकि मरने के बाद भी आपकी आंखें स्मार्ट सिटी से होते हुए बुलेट ट्रेन की प्रतीक्षा करती रहें!”
पहली नजर में यह एक मजाक है। दूसरी नजर में राजनीतिक कटाक्ष। लेकिन तीसरी नजर से देखिए तो यह हमारे समय का एक गंभीर सामाजिक सवाल बन जाता है—क्या हम विकास को अपनी आंखों से देख रहे हैं, या केवल दूसरों के दावों के चश्मे से?
बेशक, स्मार्ट सिटी बननी चाहिए। बुलेट ट्रेन भी चलनी चाहिए। बड़े-बड़े पुल, चमचमाती सड़कें, आधुनिक अस्पताल और विश्वस्तरीय सुविधाएं भी देश की जरूरत हैं। आखिर विकास का विरोध करके कोई समाज आगे कैसे बढ़ सकता है?
लेकिन सवाल यह है कि विकास की इस तस्वीर में वह आम आदमी कहां खड़ा है, जो रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है? वह युवा कहां है, जो डिग्री हाथ में लेकर रोजगार की तलाश में भटक रहा है? वह मजदूर कहां है, जिसकी मेहनत से कारखानों की चिमनियां धुआं उगलती हैं, लेकिन जिसके अपने घर का चूल्हा कभी-कभी ठंडा रह जाता है?
और वह ग्रामीण कहां है, जिसे छोटी-सी बीमारी के इलाज के लिए भी दूर शहर का रास्ता देखना पड़ता है?
विकास की तस्वीर में चमक जरूर होनी चाहिए, लेकिन उस चमक में आम आदमी का चेहरा भी दिखाई देना चाहिए।

स्मार्ट सिटी की रोशनी और गांव की अंधेरी रात!
विकास के बड़े-बड़े सपने देखना गलत नहीं है। गलत तब होता है, जब सपनों की चर्चा इतनी बड़ी हो जाए कि हकीकत पर बात करना ही छोटा काम समझ लिया जाए।
शहर स्मार्ट हो रहा है, अच्छी बात है। लेकिन गांव का अस्पताल कब स्मार्ट होगा? डिजिटल व्यवस्था आगे बढ़ रही है, स्वागत है। लेकिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता आम नागरिक कब राहत की सांस लेगा?
सड़कें चौड़ी हो रही हैं, यह खुशी की बात है। मगर उन सड़कों के किनारे रहने वाले गरीबों, विस्थापितों और मेहनतकश परिवारों की जिंदगी में भी कुछ चौड़ाई आनी चाहिए—उनके अवसरों में, उनकी आमदनी में और उनके भविष्य की उम्मीदों में।
बुलेट ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़े, किसे आपत्ति होगी? लेकिन उस गरीब की जिंदगी की रफ्तार भी तो बढ़े, जो वर्षों से अपनी बुनियादी जरूरतों की लाइन में खड़ा है।
क्योंकि विकास का अर्थ केवल यह नहीं कि देश कितनी तेज दौड़ रहा है। विकास का अर्थ यह भी है कि दौड़ में पीछे छूट रहे लोगों को आगे लाने के लिए क्या किया जा रहा है।

अंधभक्ति किसकी और आंखें किसकी बंद हैं?
अब जरा उन लोगों की भी बात कर ली जाए, जिन्हें सोशल मीडिया की भाषा में 'अंधभक्त' कहा जाता है।
यह शब्द किसी एक राजनीतिक दल, नेता या समर्थक की जागीर नहीं है। समाज में ऐसी मानसिकता अलग-अलग खेमों में मिल सकती है। कोई अपने पसंदीदा नेता के हर फैसले को सही मानता है, तो कोई अपने प्रिय संगठन की हर गलती पर पर्दा डाल देता है। कोई अपने विचारों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दुश्मनी समझ लेता है, तो कोई सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देता है।
यही वह जगह है, जहां समर्थन और अंधसमर्थन के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
किसी नेता का समर्थन करना आपका अधिकार है। किसी सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा करना भी आपका अधिकार है। लेकिन क्या समर्थन का अर्थ यह हो सकता है कि गलत को गलत कहने का अधिकार भी किसी और को दे दिया जाए?
अगर आपका पसंदीदा नेता अच्छा काम करता है, तो उसकी प्रशंसा कीजिए। अगर उससे गलती होती है, तो सुधार की मांग कीजिए। आखिर लोकतंत्र में नेता जनता के लिए होते हैं, जनता नेताओं के लिए नहीं।
नेता के प्रति सम्मान रखिए, लेकिन अपने विवेक को गिरवी मत रखिए।
याद रखिए, सवाल पूछने वाला हर व्यक्ति विरोधी नहीं होता और प्रशंसा करने वाला हर व्यक्ति गलत नहीं होता। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि हम तथ्यों को कितना महत्व देते हैं और अपनी पसंद से ऊपर सच को कितना स्थान देते हैं।

नेत्रदान से पहले विवेकदान की जरूरत!
सोशल मीडिया का वह व्यंग्य अपनी जगह है कि आंखें दान कर जाइए, ताकि मरने के बाद भी आपकी आंखें स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन का इंतजार करती रहें।
लेकिन जरा सोचिए, आंखें दान करना तो पुण्य का काम है। इससे किसी जरूरतमंद को दुनिया देखने का अवसर मिल सकता है। फिर आंखों को लेकर इस व्यंग्य का असली संदेश क्या है?
शायद यह कि आंखें होते हुए भी अगर हम जमीन की सच्चाई नहीं देखना चाहते, तो समस्या आंखों में नहीं, नजरिये में है।
और नजरिया बदलने के लिए किसी अस्पताल में ऑपरेशन कराने की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है अपने भीतर झांकने की।
हमें यह देखना होगा कि कहीं हम चमकदार प्रचार को ही संपूर्ण विकास तो नहीं मान बैठे? कहीं हम अपने पसंदीदा विचार की रक्षा करते-करते उन लोगों की पीड़ा तो नहीं भूल रहे, जिनकी आवाज हम तक पहुंचनी चाहिए?
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम दूसरों की गलतियां गिनने में इतने व्यस्त हैं कि अपने खेमे की कमियों पर नजर डालना ही भूल गए हैं?
इसलिए आज समाज को केवल नेत्रदान का संदेश नहीं, बल्कि विवेकदान, संवेदनादान और सवाल पूछने की आजादी को बचाए रखने का संदेश भी चाहिए।
आंखें खुली हों, दिमाग सक्रिय हो और दिल में इंसानियत बची रहे—तभी लोकतंत्र की तस्वीर साफ दिखाई देगी।
सवाल सरकार से भी, समाज से भी और खुद से भी!
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है। लेकिन समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।
अगर कहीं विकास का काम हुआ है, तो उसे स्वीकार कीजिए। अगर कहीं गड़बड़ी है, तो प्रमाण के साथ सवाल उठाइए। अगर कोई योजना गरीबों को लाभ पहुंचा रही है, तो उसकी सराहना कीजिए। अगर उसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा, तो जवाब मांगिए।
न तो हर सरकारी योजना को विफल बताना पत्रकारिता है और न हर सरकारी दावे को बिना जांच के सच मान लेना समझदारी।
पत्रकारिता का काम किसी की आंखें बंद करना नहीं, बल्कि तथ्यों के सहारे तस्वीर को साफ करना है।
और जनता का काम केवल तालियां बजाना या विरोध में नारे लगाना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि उसके जीवन में क्या बदला है, क्या बदलना बाकी है और बदलाव के लिए किससे जवाब मांगा जाना चाहिए।
क्योंकि देश केवल सरकार से नहीं चलता। देश जनता की जागरूकता, संस्थाओं की जवाबदेही और समाज की संवेदनशीलता से भी आगे बढ़ता है।

अंत में—बुलेट ट्रेन का इंतजार कीजिए, लेकिन सवालों को स्टेशन पर मत छोड़िए!
स्मार्ट सिटी बनेगी तो हमें खुशी होगी। बुलेट ट्रेन दौड़ेगी तो हमें भी गर्व होगा। देश आगे बढ़ेगा तो हर भारतीय का सिर ऊंचा होगा।
लेकिन इस यात्रा में अस्पताल की कतार में खड़ा गरीब, नौकरी तलाशता युवा, मेहनताना मांगता मजदूर, विस्थापन का दर्द झेलता परिवार और गांव में बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा करता नागरिक भी साथ चले—यही तो असली विकास की कसौटी है।
किसी की राजनीतिक पसंद का मजाक उड़ाना आसान है, लेकिन उसके सामने तथ्यों के साथ सवाल रखना ज्यादा जरूरी है। किसी को अंधभक्त कहकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन उसे सोचने के लिए प्रेरित करना असली सामाजिक जिम्मेदारी है।
इसलिए तंज अपनी जगह, हास्य अपनी जगह और राजनीति अपनी जगह।
आंखें दान जरूर कीजिए, लेकिन जीते-जी अपनी नजर मत खोइए। नेताओं का समर्थन कीजिए, मगर सच का साथ छोड़कर नहीं। विकास का स्वागत कीजिए, मगर उसकी जमीन पर उतरकर जांच भी कीजिए।
क्योंकि जिस दिन जनता ने सवाल पूछना छोड़ दिया, उस दिन केवल विकास की रफ्तार ही नहीं रुकेगी—लोकतंत्र की दिशा भी धुंधली पड़ने लगेगी।
और हां, बुलेट ट्रेन का इंतजार करते समय इतना जरूर याद रखिएगा—ट्रेन देर से आए तो स्टेशन पर सवाल पूछे जा सकते हैं, लेकिन अगर सवाल पूछने की आदत ही छूट गई, तो मंजिल सामने होने के बावजूद हम रास्ता भटक सकते हैं।
जमीनी आवाज की बात साफ है—न अंधविरोध, न अंधसमर्थन; न प्रचार से दुश्मनी, न प्रचार पर आंख मूंदकर भरोसा। हमारा पक्ष वही है, जो प्रमाण, जनहित और इंसानियत के साथ खड़ा हो।
क्योंकि आंखें सबके पास हैं, लेकिन जमीन की सच्चाई देखने के लिए नजरिया भी चाहिए!