इंदौर से शुरू हुआ विवाद अब राष्ट्रीय बहस बना
इंदौर के मंच से शुरू हुआ पुलकित मणि का मिमिक्री विवाद अब सिर्फ एक कॉमेडियन के कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रह गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री के बाद पुलकित मणि ने नोएडा, लखनऊ और कानपुर के अपने कार्यक्रम रद्द होने की जानकारी दी। लखनऊ और कानपुर के कार्यक्रमों को लेकर उन्होंने लगातार धमकियां मिलने का दावा किया है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि कार्यक्रम आयोजकों ने रद्द किए या स्वयं मणि ने।


आखिर पुलकित मणि ने ऐसा क्या कर दिया?
उन्होंने किसी को मारा नहीं। किसी सरकारी कार्यालय में तोड़फोड़ नहीं की। किसी की संपत्ति नहीं जलाई। और जिस व्यंग्यात्मक अभिनय को लेकर इतना बवाल है, उसमें प्रधानमंत्री का नाम लेकर कोई अश्लील भाषण भी नहीं दिया गया। यह मिमिक्री प्रधानमंत्री की शैली, हाव-भाव और सार्वजनिक तौर पर दिखाई देने वाली छवियों की नकल भर थी। तो फिर सवाल यह है कि राजनीतिक व्यंग्य कब से लोकतंत्र के लिए खतरा बन गया?
"लवणेन भोज्यम्" शब्द का असली अर्थ
इस पूरे विवाद में एक शब्द को लेकर भी खूब चर्चा हो रही है—"लवणेन भोज्यम्"। इसे अश्लील अर्थ देने से पहले इसका वास्तविक अर्थ समझना जरूरी है। यह संस्कृत के उस विचार से जुड़ा है जिसमें भोजन में नमक की आवश्यकता की उपमा देते हुए राज्य के लिए न्याय की आवश्यकता बताई जाती है। जिस शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के अर्थ निकाले जा रहे हैं, वह अपने मूल संदर्भ में न्याय और शासन से जुड़ा हुआ है। जब शब्द का अर्थ ही न्याय से जुड़ा है, तो डर किस बात का?
क्या आलोचना का पैमाना सबके लिए एक जैसा है?
राजनीति में हाव-भाव, इशारे, व्यंग्य और संकेत हमेशा से भाषण का हिस्सा रहे हैं। प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों या विपक्ष के नेता—सार्वजनिक जीवन में नेताओं के शब्दों के साथ उनके हाव-भाव भी कैमरों में दर्ज होते हैं और जनता उन्हें अपने-अपने तरीके से समझती है। प्रधानमंत्री मोदी के भी अनेक भाषणों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के ऐसे हाव-भाव और राजनीतिक इशारे रहे हैं जिन्हें अलग-अलग राजनीतिक समूहों ने अलग-अलग अर्थों में लिया है।
तो फिर सवाल यह है—अगर जनता या कोई कलाकार किसी नेता के हाव-भाव की मिमिक्री करे तो उसे अपमान क्यों माना जाए, जबकि राजनीतिक मंच पर नेताओं के इशारों और व्यंग्यात्मक प्रस्तुतियों को राजनीतिक अभिव्यक्ति माना जाता है?
जमीनी आवाज किसी अश्लीलता का समर्थन नहीं करता। लेकिन अश्लीलता की परिभाषा सबके लिए एक जैसी होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता को हर अभिव्यक्ति से सहमत होना जरूरी नहीं, लेकिन हर असहमति को प्रतिबंध में बदल देना भी लोकतंत्र का रास्ता नहीं हो सकता।
भाषणों में तीखे राजनीतिक हमले नए नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद और चुनावी मंचों से नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों तथा राजनीतिक विरासत पर अनेक बार तीखी टिप्पणियां की हैं। दूसरी ओर विपक्षी नेता भी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर तीखे राजनीतिक हमले करते रहे हैं। राजनीति में यह टकराव नया नहीं है।
लेकिन अगर सत्ता पक्ष के नेता विपक्ष पर तीखा हमला करें तो उसे राजनीतिक बहस कहा जाए और उसी सत्ता के नेता की मिमिक्री करने पर कलाकार का मंच ही संकट में पड़ जाए—तो जनता सवाल जरूर पूछेगी। पैमाना एक क्यों नहीं?
लोकतंत्र तय करेगा, सत्ता नहीं
क्या प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उनका सम्मान होना चाहिए? बिल्कुल होना चाहिए। लेकिन क्या प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उन पर व्यंग्य नहीं हो सकता? यह लोकतंत्र तय करेगा—सत्ता नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री भी संविधान से ऊपर नहीं हैं और जनता भी सत्ता की प्रजा नहीं है।
जनता सवाल पूछेगी। जनता आलोचना करेगी। जनता व्यंग्य करेगी। कलाकार मिमिक्री करेगा। कार्टूनिस्ट कार्टून बनाएगा। पत्रकार सवाल करेगा। और सत्ता को इन सबका जवाब देना होगा। सत्ता को सिर्फ तालियां सुनने की आदत पड़ जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
आज पुलकित मणि, कल कौन?
आज सवाल पुलकित मणि का है। कल सवाल किसी पत्रकार का हो सकता है। परसों किसी कार्टूनिस्ट का। और उसके बाद किसी आम नागरिक का। इसलिए मुद्दा यह नहीं कि पुलकित मणि की मिमिक्री किसी को अच्छी लगी या बुरी। मुद्दा यह है कि क्या किसी राजनीतिक व्यक्ति की मिमिक्री करने भर से कलाकार के मंच बंद होने चाहिए?
यदि मिमिक्री में कोई कानून तोड़ा गया है, तो कानून अपना रास्ता अपनाए। यदि कोई स्पष्ट अश्लीलता है, तो उसकी जांच हो। यदि कोई मानहानिकारक तथ्य है, तो कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध है। लेकिन धमकी देकर मंच बंद कर देना लोकतांत्रिक बहस का विकल्प नहीं हो सकता।
जमीनी आवाज का सवाल
क्योंकि जिस दिन कलाकार सत्ता से डरकर हंसना बंद कर देगा, जिस दिन पत्रकार सत्ता से डरकर सवाल पूछना बंद कर देगा और जिस दिन जनता सत्ता से डरकर अपनी बात कहना बंद कर देगी—उस दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी क्षति किसी एक नेता की नहीं होगी। नुकसान जनता का होगा।
प्रधानमंत्री पर व्यंग्य करने से अगर लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है, तो फिर सत्ता की आलोचना की आजादी किस काम की? आईना अगर चेहरा दिखाए तो चेहरा बदलना चाहिए, आईना तोड़ना नहीं। और लोकतंत्र में सत्ता जितनी बड़ी होती है, उसे उतना ही बड़ा दिल रखकर आलोचना सुननी चाहिए।
क्योंकि जो सत्ता सवाल से डरती है, उसे सवाल से भागना नहीं चाहिए; सवाल का जवाब देना चाहिए।





