घाटशिला में गंदगी बरकरार, सरकारी जवाब में सब ठीक! आखिर किसकी नजर से स्वच्छ दिख रहा शहर?

सक्रिय संवेदना ने उपायुक्त से फिर लगाई गुहार, सहसंयोजक विजय कुमार पांडे ने जमीनी हकीकत और प्रशासनिक दावों के बीच अंतर पर उठाए सवाल।

जमीनी आवाज की लगातार तीन खबरों के बाद भी मेन रोड स्थित कॉमर्स प्लाजा की स्थिति में बदलाव नहीं; तस्वीरें सामने होने के बावजूद सफाई व्यवस्था पर सवाल, आखिर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

घाटशिला, 29 अक्टूबर। घाटशिला की स्वच्छता व्यवस्था क्या वास्तव में दुरुस्त है, या फिर सरकारी कागजों पर ही शहर साफ-सुथरा नजर आ रहा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि एक ओर सामाजिक मंच ‘सक्रिय संवेदना’ लगातार आवेदन देकर प्रशासन का ध्यान शहर की गंदगी की ओर खींच रहा है, तो दूसरी ओर घाटशिला की मुख्य सड़क स्थित कॉमर्स प्लाजा की स्थिति में बार-बार खबरें प्रकाशित होने के बावजूद बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब जमीनी स्थिति को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तब व्यवस्था को ठीक बताने वाले दावों का आधार क्या है?

सक्रिय संवेदना ने फिर मांगा प्रशासनिक हस्तक्षेप

सक्रिय संवेदना ने घाटशिला शहरी क्षेत्र में घरेलू गीले और सूखे कचरे के नियमित संग्रहण तथा उसके वैज्ञानिक निष्पादन की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त से फिर हस्तक्षेप की मांग की है। मंच के सहसंयोजक विजय कुमार पांडे ने अपने आवेदन में कहा है कि घाटशिला में स्वच्छता की स्थिति संतोषजनक नहीं है और समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रशासन को ठोस कदम उठाने चाहिए।

आवेदन, अग्रसारण और जवाब—लेकिन जमीन पर बदलाव कहां?

सक्रिय संवेदना के अनुसार, इस समस्या को लेकर पहले भी उपायुक्त को आवेदन दिया गया था। इसके बाद आवेदन को जिला पंचायत राज पदाधिकारी और घाटशिला के प्रखंड विकास पदाधिकारी के पास कार्रवाई के लिए भेजे जाने की जानकारी मिली। मंच को यह सूचना भी दी गई कि 6 अक्टूबर को समस्या के समाधान के संबंध में उपायुक्त कार्यालय की ओर से मोबाइल संदेश भेजा गया था।

लेकिन सवाल यह है कि यदि समस्या का समाधान हो चुका है, तो उसकी पुष्टि जमीन पर किस आधार पर की गई?

मंच का कहना है कि घाटशिला में घरेलू कचरे के नियमित संग्रहण और उसे निर्धारित डंपिंग ग्राउंड तक पहुंचाने की व्यवस्था अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती। विजय कुमार पांडे ने एक बार फिर प्रशासन से आग्रह किया है कि स्वच्छता के संबंध में किए जा रहे दावों की वास्तविक स्थिति की जांच कराई जाए और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए जाएं।

मामले में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उपायुक्त कार्यालय ने इस शिकायत के संबंध में घाटशिला के प्रखंड विकास पदाधिकारी से जवाब मांगा था। इसके जवाब में स्थिति अनुकूल और ठीक होने की बात कही गई। यदि प्रशासनिक जवाब में व्यवस्था को संतोषजनक बताया गया है, तो शिकायतकर्ता मंच की असहमति और सामने मौजूद जमीनी उदाहरणों की जांच क्यों न हो? क्या केवल कार्यालयी जवाब के आधार पर स्वच्छता व्यवस्था को दुरुस्त मान लेना उचित होगा?

यह सवाल किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों की शिकायतों के निष्पक्ष सत्यापन के लिए उठाया जा रहा है।

कॉमर्स प्लाजा की स्थिति पर तीसरी खबर, फिर भी सफाई का इंतजार

घाटशिला की मुख्य सड़क स्थित कॉमर्स प्लाजा का मामला इस पूरे विवाद का प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर सामने आया है। जमीनी आवाज इस परिसर की गंदगी और सफाई की समस्या को लेकर पहले भी लगातार तीन बार खबरें प्रकाशित कर चुका है। इसके बावजूद उपलब्ध जानकारी और सामने आई तस्वीरों के अनुसार, वहां की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।

बीच बाजार स्थित किसी व्यावसायिक परिसर में यदि गंदे पानी, कचरे और अस्वच्छ वातावरण की समस्या बनी रहती है, तो उसका असर केवल उस परिसर तक सीमित नहीं रहता। बाजार आने-जाने वाले नागरिकों, दुकानदारों और आसपास के लोगों को भी परेशानी उठानी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में नियमित सफाई, कचरे के उचित निष्पादन और जिम्मेदार एजेंसी की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।

जब एक ही स्थान की समस्या को लेकर बार-बार खबरें प्रकाशित हो रही हों और तस्वीरें भी जमीनी स्थिति की ओर ध्यान खींच रही हों, तो संबंधित अधिकारियों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे केवल शिकायतों के निस्तारण का रिकॉर्ड न देखें, बल्कि मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन भी करें।

यहां सवाल उठता है कि यदि कॉमर्स प्लाजा जैसे व्यस्त बाजार क्षेत्र में सफाई की समस्या बनी हुई है, तो पूरे शहरी क्षेत्र की स्वच्छता व्यवस्था को संतोषजनक बताने से पहले किन मानकों और किन स्थानों का निरीक्षण किया गया? क्या शिकायतकर्ता की बात और प्रशासनिक जवाब के बीच मौजूद अंतर को दूर करने के लिए स्थल निरीक्षण कराया गया है? यदि कराया गया है, तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक होने चाहिए, ताकि नागरिकों को वास्तविक स्थिति का पता चल सके।

जमीनी आवाज का उद्देश्य किसी अधिकारी को कठघरे में खड़ा करना मात्र नहीं, बल्कि उस समस्या का समाधान सुनिश्चित कराने के लिए सवाल उठाना है, जिसका सामना आम नागरिक कर रहे हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि जब किसी समस्या को बार-बार सामने लाने के बाद भी अपेक्षित बदलाव नहीं दिखता, तो प्रशासनिक कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्वच्छता के दावे नहीं, जमीन पर परिणाम चाहिए

सक्रिय संवेदना के प्रो. मित्रेश्वर ने घरेलू कचरे के उचित प्रबंधन को आम नागरिकों के स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा बुनियादी प्रश्न बताया है। वहीं, विजय कुमार पांडे का कहना है कि किसी भी शहर की स्वच्छता का आकलन कागजी कार्रवाई से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होना चाहिए।

यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है। घरों से गीले और सूखे कचरे का नियमित संग्रहण, कचरे का पृथक्करण, निर्धारित स्थल तक उसका परिवहन और अंतिम निष्पादन—ये सभी स्वच्छता व्यवस्था के आवश्यक हिस्से हैं। यदि इनमें से किसी स्तर पर कमी है, तो केवल सामान्य तौर पर व्यवस्था ठीक होने का जवाब समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता।

घाटशिला प्रशासन के सामने अब दो स्पष्ट अपेक्षाएं हैं। पहली, शहर की स्वच्छता व्यवस्था का निष्पक्ष और वास्तविक निरीक्षण हो। दूसरी, कॉमर्स प्लाजा सहित उन स्थानों पर तत्काल ध्यान दिया जाए, जहां गंदगी की शिकायतें बार-बार सामने आ रही हैं। संबंधित विभागों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कचरा संग्रहण की जिम्मेदारी किसकी है, नियमित सफाई की निगरानी कैसे होती है और शिकायत मिलने पर कार्रवाई की समयसीमा क्या है।

जमीनी आवाज का स्पष्ट सवाल है—अगर घाटशिला साफ है, तो गंदगी की बार-बार सामने आने वाली तस्वीरों का जवाब कौन देगा? और अगर सफाई व्यवस्था में कमी है, तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

स्वच्छता किसी सरकारी फाइल में दर्ज उपलब्धि भर नहीं है। उसकी असली कसौटी सड़क, बाजार, नाली और नागरिकों के आसपास का वातावरण है। सक्रिय संवेदना की लगातार अपील और कॉमर्स प्लाजा की स्थिति को देखते हुए प्रशासन को चाहिए कि वह शिकायतों को औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित न रखे, बल्कि मौके पर सत्यापन कर आवश्यक कार्रवाई करे।

घाटशिला के नागरिकों को आश्वासन से अधिक परिणाम चाहिए। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनके शहर की सफाई व्यवस्था वास्तव में कैसी है और उसमें कमी मिलने पर उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी इस सवाल का जवाब कागज पर देते हैं या घाटशिला की सड़कों और बाजारों में सफाई के रूप में उसका प्रमाण भी दिखाई देता है।

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