जमीनी आवाज | विशेष रिपोर्ट

चांडिल (सरायकेला-खरसावां), 31 अक्टूबर।

चांडिल बांध सुवर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना में विस्थापन और पुनर्वास का मामला एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इस बार सवाल केवल मुआवजे या पुनर्वास सुविधाओं का नहीं, बल्कि 13 करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी राशि के भुगतान में कथित अनियमितता का है। आरोप है कि RL-180 मीटर से ऊपर स्थित 10 गांवों के वास्तविक विस्थापित परिवारों के लिए निर्धारित पुनर्वास राशि दूसरे गांवों के कथित अपात्र लाभुकों को भुगतान कर दी गई। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह मामला सरकारी धन के उपयोग के साथ-साथ दशकों से अपने अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे विस्थापित परिवारों के न्याय से भी जुड़ा होगा।

मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड सरकार के जल संसाधन विभाग ने अपर सचिव की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति में संयुक्त सचिव, दो अधीक्षण अभियंता और एक उप सचिव शामिल हैं। समिति को पूरे मामले की पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। अब सवाल यह है कि जांच में भुगतान की प्रक्रिया, लाभुकों की पात्रता और संबंधित विभागीय पदाधिकारियों की भूमिका की कितनी गहराई से पड़ताल होती है।

चांडिल में जांच समिति के सामने विस्थापितों ने रखे सवाल

शुक्रवार, 30 अक्टूबर को चांडिल डैम आईबी कॉलोनी, घोड़ानेगी में जांच समिति ने संबंधित लोगों और विस्थापित संगठनों के प्रतिनिधियों से पूछताछ की। इस दौरान अपर निदेशक, संबंधित राजस्व पदाधिकारी, जिला परिषद उपाध्यक्ष तथा विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन, विस्थापित मुक्ति वाहिनी और 116 गांव युवा विस्थापित संगठन के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

बैठक में संगठनों ने मांग की कि RL-180 मीटर से ऊपर स्थित 10 गांवों के वास्तविक विस्थापित परिवारों को उनका अधिकार दिलाया जाए। 13 करोड़ रुपये से अधिक के भुगतान की निष्पक्ष जांच हो और यह सार्वजनिक किया जाए कि किस गांव के किस पात्र लाभुक को कितनी राशि का भुगतान किया गया। संगठनों का कहना था कि भुगतान की पूरी सूची सार्वजनिक हुए बिना वास्तविक लाभुकों और कथित अपात्र लाभुकों की पहचान तथा भुगतान का सत्यापन संभव नहीं है।

भुगतान सूची सार्वजनिक क्यों नहीं? जवाबदेही तय करने की मांग

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल भुगतान की पारदर्शिता को लेकर है। विस्थापित संगठनों का आरोप है कि पुनर्वास राशि के भुगतान से संबंधित सूची सार्वजनिक नहीं की जाती। यदि भुगतान नियमानुसार और पात्रता के आधार पर हुआ है तो सूची सार्वजनिक करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? किस गांव के नाम पर कितनी राशि स्वीकृत हुई, किसे भुगतान किया गया और लाभुक की पात्रता का सत्यापन किस आधार पर हुआ—इन सभी सवालों का जवाब जांच में सामने आना चाहिए।

संगठनों ने मांग की कि भुगतान सूची उनकी मौजूदगी में सार्वजनिक की जाए और गांववार सत्यापन कराया जाए। यदि जांच में किसी पदाधिकारी या विभागीय स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय कर नियमानुसार कार्रवाई हो। साथ ही, किसी गरीब और वास्तविक विस्थापित लाभुक पर निष्पक्ष जांच के बिना रिकवरी या विकास पुस्तिका सरेंडर करने का दबाव नहीं बनाया जाए।

1987 से आंदोलन, पुनर्वास की कहानी में आज भी अधूरे सवाल

विस्थापित मुक्ति वाहिनी के प्रतिनिधि ने बताया कि संगठन का गठन 1987 में हुआ था और आंदोलन के बाद 1990 में पुनर्वास नीति बनी। समय-समय पर मुआवजे की राशि में बदलाव हुआ। उनके अनुसार शुरुआती दौर में 25 हजार और 20 हजार रुपये के पैकेज दिए गए। बाद में 2003 में यह राशि 1 लाख 87 हजार और 2012 में 6 लाख 97 हजार रुपये तक पहुंची।

उन्होंने बाकसाई गांव का उदाहरण देते हुए बताया कि एक मकान के बदले मात्र 312 रुपये का भुगतान किया गया था। सवाल उठता है कि इतनी कम राशि में विस्थापित परिवार अपना घर कैसे बना सकते थे? उन्होंने वर्ष 2018 से 2026 तक के विभागीय भुगतान और पुनर्वास संबंधी मामलों की जांच कराने की मांग की।

प्रतिनिधि ने बांधडीह और छोटा आमड़ा जैसे गांवों का भी उल्लेख किया, जहां पूरी जमीन डूब क्षेत्र में चले जाने के बावजूद उनके अनुसार एक भी परिवार को पूर्ण डूब क्षेत्र के आधार पर विकास पुस्तिका नहीं मिली। उन्होंने परियोजना के पानी के औद्योगिक उपयोग, स्थानीय विस्थापितों को रोजगार और पुनर्वास स्थलों पर ट्रेनिंग कम प्रोडक्शन सेंटर की व्यवस्था नहीं होने का मुद्दा भी उठाया।

जलस्तर बढ़ाने से पहले विस्थापितों का लंबित हक चुकाने की मांग

विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के प्रतिनिधि ने जांच समिति के समक्ष कहा कि जलस्तर को RL-183 मीटर तक बढ़ाने की चर्चा से पहले मौजूदा विस्थापन और पुनर्वास संबंधी समस्याओं का समाधान जरूरी है। उनका कहना था कि पहले RL की बाध्यता समाप्त कर गांववार लंबित भुगतान का निपटारा किया जाए। 40-42 वर्ष पहले जिन परिवारों के नाम पर विकास पुस्तिकाएं बनी थीं, उनकी अगली पीढ़ी के अधिकारों और वर्तमान पात्रता का भी निष्पक्ष आकलन होना चाहिए।

उन्होंने पहले 25 डिसमिल जमीन के स्थान पर अब 12.5 डिसमिल जमीन दिए जाने के प्रावधान पर पुनर्विचार की मांग की। साथ ही कपाली, कटिया और बनकाटी जैसे पुनर्वास क्षेत्रों में जमीन के उपयोग, कथित अवैध कब्जे, तालाबों की स्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। संगठनों ने मांग की कि पुनर्वास स्थलों पर बाउंड्री वॉल, सड़क, नाली, बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

रोजगार, बाजार और पर्यटन के वादे भी अधूरे

बैठक में विस्थापित संगठनों ने मुआवजे की कथित अनियमितता के साथ-साथ प्रभावित परिवारों के भविष्य से जुड़े कई प्रस्ताव भी रखे। परियोजना और उससे पानी लेने वाली औद्योगिक कंपनियों में स्थानीय विस्थापित युवाओं को रोजगार देने की मांग की गई। मुखिया होटल से अनुमंडल कार्यालय तक बाजार क्षेत्र विकसित कर दुकानें विस्थापित परिवारों को आवंटित करने का प्रस्ताव भी रखा गया।

इसके अतिरिक्त रसुनिया, दुलमी और पातकुम में नौका विहार तथा पर्यटन सुविधाओं के विकास की मांग की गई। पुनर्वास स्थलों पर पट्टा, बाउंड्री वॉल, सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया। संगठनों का कहना था कि विस्थापन के बाद केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक जीवन और आजीविका के अवसर भी मिलने चाहिए।

जांच समिति की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल

पूरे मामले में एक और पहलू चर्चा का विषय रहा। जांच के लिए चांडिल पहुंची पांच सदस्यीय समिति के अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत करने से दूरी बनाए रखी। जांच प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों की ओर से विस्तृत जानकारी नहीं दी गई। इतने गंभीर वित्तीय और पुनर्वास संबंधी आरोपों के बीच जांच की प्रक्रिया, उसका दायरा और निष्कर्षों को लेकर पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक है।

अब जांच रिपोर्ट से तय होगी आगे की दिशा

चांडिल बांध परियोजना से जुड़े विस्थापन का सवाल दशकों पुराना है। पीढ़ियां बदल गईं, पुनर्वास नीतियों में संशोधन हुए और मुआवजे की रकम भी बढ़ी, लेकिन विस्थापित संगठनों के आरोप बताते हैं कि जमीन पर कई समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। 13 करोड़ रुपये से अधिक के कथित भुगतान की अनियमितता ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

अब जांच समिति के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह केवल शिकायतें सुनकर औपचारिक रिपोर्ट तक सीमित न रहे, बल्कि वर्षवार भुगतान रिकॉर्ड, लाभुकों की पात्रता, गांववार सूची, विकास पुस्तिकाओं और संबंधित विभागीय अभिलेखों का मिलान करे। यदि भुगतान में गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार पदों और कार्यालयों की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए तथा वास्तविक विस्थापितों को उनका अधिकार मिलना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस परियोजना के लिए लोगों ने अपनी जमीन, घर और पुश्तैनी गांव छोड़े, उसी परियोजना के पुनर्वास की राशि पर यदि अपात्र लोगों का अधिकार बन गया है, तो वास्तविक विस्थापितों को न्याय कौन दिलाएगा?

जमीनी आवाज इस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों, भुगतान संबंधी अभिलेखों और प्रभावित परिवारों के प्रमाणों के आधार पर आगे भी पड़ताल जारी रखेगा।

रिपोर्ट: विजय कुमार गोपे