180 RL के पार पहुंचा जलस्तर
चांडिल डैम... पहाड़ियों, जंगलों और अथाह जलराशि के बीच बसा ऐसा मनमोहक जलाशय, जिसकी खूबसूरती बरबस लोगों को अपनी ओर खींचती है। लेकिन इसी खूबसूरत तस्वीर के पीछे डूब क्षेत्र के किसानों की एक दूसरी तस्वीर भी है—पकती धान की फसल, बढ़ता पानी और आंखों में डूबती मेहनत का डर।

23 सितंबर 2026 की शाम 4 बजे की रिपोर्ट के अनुसार चांडिल डैम का जलस्तर 180.45 मीटर RL पहुंच गया है, यानी निर्धारित 180 मीटर के स्तर से 0.45 मीटर ऊपर। डैम में इस समय 507.82 MCM पानी का भंडारण बताया गया है।
जलस्तर बढ़ने के बीच डैम से कुल 418.49 क्यूमेक्स पानी की निकासी की जा रही है। इसमें रेडियल गेट से 253.73 क्यूमेक्स, रिवर स्लूइस से 13.50 क्यूमेक्स, इमरजेंसी स्लूइस से 118.84 क्यूमेक्स तथा कैनाल से 32.42 क्यूमेक्स पानी छोड़ा जा रहा है।
जलाशय की सुंदरता के बीच खेतों पर मंडराता खतरा
चांडिल डैम की विशाल जलराशि देखने में जितनी आकर्षक है, उसके आसपास के डूब क्षेत्र में रहने वाले किसानों के लिए बढ़ता जलस्तर उतना ही बड़ा सवाल बन जाता है। धान की फसल अब आधी से अधिक पक चुकी है। कई इलाकों में किसान कटाई की तैयारी में हैं। ऐसे समय खेतों में पानी का प्रवेश केवल कुछ दिनों की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे मौसम की मेहनत और लागत पर संकट बन सकता है।
विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने इसी स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस वर्ष मानसून के दौरान यह पहली बार नहीं है जब चांडिल डैम का जलस्तर 180 RL के पार गया है। अगस्त और सितंबर में भी कई बार जलस्तर 180 RL से ऊपर पहुंचने और बड़े पैमाने पर पानी छोड़े जाने की स्थिति बनी।
बैठक में फैसला 180 RL से नीचे रखने का था, फिर बार-बार पार क्यों?
राकेश रंजन महतो के अनुसार मानसून से पहले जिला आपदा प्रबंधन की बैठक में डैम का जलस्तर 180 RL से नीचे रखने, कंट्रोल रूम को सक्रिय रखने और संभावित बाढ़ से निपटने की तैयारी रखने के निर्देश दिए गए थे। अब सवाल यह है कि यदि 180 RL के ऊपर जलस्तर नहीं जाने देने की तैयारी थी, तो बार-बार 180 RL पार होने की स्थिति क्यों बन रही है? महतो ने कहा कि बैठकें सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि उनका असर खेतों में दिखाई देना चाहिए।
रोपनी के वक्त भी पानी, अब कटनी के वक्त भी डर
राकेश रंजन महतो ने कहा कि जब किसान धान की रोपनी कर रहे थे, तब भी जलस्तर बढ़ने के कारण कई निचले खेतों में पानी प्रवेश करने की शिकायत सामने आई थी। अब जब वही फसल पकने की ओर है और कटाई का समय करीब है, फिर बढ़ता जलस्तर किसानों की चिंता बढ़ा रहा है।
"किसान साल भर मेहनत करता है। पकती फसल में पानी घुसने से पूरी लागत डूब जाती है। डैम प्रबंधन की लापरवाही का बोझ किसान क्यों उठाए?" — राकेश रंजन महतो, अध्यक्ष, विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन
मंच ने मांग की है कि जिन किसानों के खेत प्रभावित होते हैं, उनका तत्काल सर्वे कराया जाए और फसल क्षति का मुआवजा दिया जाए।
एक तरफ पानी बढ़ रहा, दूसरी तरफ विस्थापितों के अधिकार अटके
चांडिल डैम का सवाल केवल जलस्तर और फसल तक सीमित नहीं है। इसके साथ वर्षों से जुड़ा विस्थापन और पुनर्वास का सवाल भी एक बार फिर सामने आ गया है। राकेश रंजन महतो का कहना है कि कई विस्थापित परिवार आज भी अपने अधिकारों के लिए भटक रहे हैं। कई परिवारों की विकास पुस्तिका तक नहीं बनी है। जिनकी बनी है, उनमें भी अनुदान राशि मिलने का मामला लंबित है।
सवाल सिर्फ 180 RL का नहीं, जवाबदेही का भी है
चांडिल डैम की पहाड़ियों के बीच चमकती जलराशि पर्यटकों को आकर्षित करती है। लेकिन इसी जलराशि के आसपास बसे गांवों के किसान और विस्थापित परिवार इसे सिर्फ खूबसूरत नजारे के रूप में नहीं देखते। उनके लिए यह पानी रोजगार, खेती, विस्थापन, मुआवजा और भविष्य से जुड़ा सवाल भी है।
विस्थापित अधिकार मंच ने जिला प्रशासन और डैम प्रबंधन से मांग की है कि जल प्रबंधन में पारदर्शिता लाई जाए, जलस्तर को निर्धारित सीमा के भीतर रखने की ठोस व्यवस्था की जाए तथा प्रभावित किसानों की फसल क्षति का आकलन कर उचित मुआवजा दिया जाए। क्योंकि चांडिल डैम की खूबसूरती तभी पूरी होगी, जब उसकी जलराशि के किनारे रहने वाले किसान और विस्थापित परिवार भी सुरक्षित भविष्य की तस्वीर देख सकें।





