67 डैमों में चयनित हुआ चांडिल
चांडिल डैम को लेकर झारखंड से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो पूरे कोल्हान के लिए गौरव का विषय बन सकती है। सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के चांडिल डैम को झारखंड के 67 डैमों में से प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। यानी राज्य के तमाम जलाशयों के बीच चांडिल डैम अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपयोगिता, सुरक्षा और बहुउद्देशीय भूमिका के आधार पर मूल्यांकन की दहलीज तक पहुंच गया है।
परियोजना के कार्यपालक अभियंता संजय कुमार ने इस नामांकन की पुष्टि करते हुए बताया कि पुरस्कार के लिए आवश्यक तकनीकी दस्तावेज, सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट तथा जन-कल्याण से संबंधित जानकारियां भारत सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर दी गई हैं। अब भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ जूरी इन दस्तावेजों की स्क्रीनिंग और अंतिम मूल्यांकन करेगी।
67 डैमों के बीच चांडिल ही क्यों?
कार्यपालक अभियंता के अनुसार झारखंड में कुल 67 डैम हैं। इनमें 58 पूर्ण निर्मित, 5 निर्माणाधीन, 3 पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तथा 1 डैम बिजली बोर्ड के अधीन है। इसके पीछे जिन प्रमुख मानकों को देखा गया है, उनमें शामिल हैं:
- सुरक्षा मानक: डैम की संरचनात्मक मजबूती, सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव।
- बहुउद्देशीय उपयोग: सिंचाई, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं।
- पुनर्वास एवं जन-कल्याण: प्रभावित और विस्थापित लोगों के लिए किए गए कार्य।
यानी चांडिल डैम का मूल्यांकन केवल पानी रोकने वाली एक संरचना के रूप में नहीं, बल्कि जल, कृषि, सुरक्षा, ऊर्जा और जनहित से जुड़ी बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में किया जा रहा है।
अब पानी पर तैरेंगे सोलर पैनल, 600 MW से बदलेगी तस्वीर
चांडिल डैम की चर्चा अब केवल जलाशय और सिंचाई तक सीमित नहीं है। यहां 600 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर पावर प्रोजेक्ट का प्रस्ताव भी इसकी भविष्य की तस्वीर बदलने वाला है। फ्लोटिंग सोलर परियोजना के तहत जलाशय की सतह पर तैरते हुए सोलर पैनल लगाए जाने हैं, जिससे जमीन अधिग्रहण किए बिना जल क्षेत्र का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकेगा। साथ ही, जल सतह पर सोलर पैनल होने से वाष्पीकरण कम करने में भी मदद मिल सकती है।
संजय कुमार के अनुसार यह प्रस्तावित परियोजना अपनी क्षमता के लिहाज से बड़ी उपलब्धि होगी, जिससे झारखंड के ऊर्जा क्षेत्र को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
उपलब्धि के साथ चांडिल की एक दूसरी कहानी भी है
लेकिन चांडिल डैम की कहानी केवल पुरस्कार, बिजली उत्पादन और विकास की कहानी नहीं है। इसके साथ विस्थापन की एक लंबी और पीड़ादायक कहानी भी जुड़ी हुई है। डैम के निर्माण के बाद प्रभावित हुए परिवारों की मांगें और पुनर्वास से जुड़े सवाल दशकों से उठते रहे हैं।
आज जब यही चांडिल डैम राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार की दौड़ में पहुंचा है, तब स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है—क्या विकास की इस राष्ट्रीय पहचान के साथ उन लोगों की आवाज भी राष्ट्रीय मंच तक पहुंचेगी, जिन्होंने इस परियोजना के लिए अपनी जमीन, घर और जीवन की पुरानी व्यवस्था छोड़ी?
राष्ट्रीय पहचान के दरवाजे पर चांडिल
राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नामांकन फिलहाल अंतिम पुरस्कार की घोषणा नहीं है। अंतिम निर्णय विशेषज्ञ जूरी के मूल्यांकन के बाद होगा। लेकिन झारखंड के 67 डैमों के बीच चांडिल का नाम राष्ट्रीय स्तर की चयन प्रक्रिया तक पहुंचना निश्चित रूप से परियोजना के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
अगर अंतिम चयन में चांडिल डैम राष्ट्रपति पुरस्कार हासिल करता है, तो यह केवल एक डैम की उपलब्धि नहीं होगी—यह झारखंड के जल संसाधन, कोल्हान की पहचान और इस परियोजना से जुड़े लोगों के लिए राष्ट्रीय स्तर की एक बड़ी पहचान होगी। जमीनी आवाज की नजर इसलिए चांडिल पर लगातार बनी हुई है—क्योंकि किसी परियोजना की असली कहानी सिर्फ उसके बांध और जलाशय में नहीं, बल्कि उसके आसपास रहने वाले लोगों की जिंदगी में भी लिखी जाती है।





