रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर प्रदर्शन, सड़क जाम; पेंशन, सम्मान, पहचान और आश्रितों को रोजगार की मांग—29 सितंबर की मशाल से 30 सितंबर के बंद तक पहुंचा आंदोलन
जमीनी आवाज का सवाल: झारखंड बनाने वालों को अपना हक पाने के लिए आखिर कितने साल और आंदोलन करना होगा?
रांची। विशंभर मिश्रा की रिपोर्ट
जिस झारखंड के लिए कभी जंगल-पहाड़ों से लेकर शहरों की सड़कों तक संघर्ष हुआ, जिस राज्य के निर्माण के लिए हजारों लोगों ने अपना समय, रोजगार, परिवार और कई मामलों में अपना सर्वस्व दांव पर लगाया—उसी झारखंड में आंदोलनकारी एक बार फिर सड़क पर हैं।
30 सितंबर 2026 को झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के राज्यव्यापी बंद के आह्वान का असर राजधानी रांची में भी दिखाई दिया। आंदोलनकारी अल्बर्ट एक्का चौक पर जुटे और प्रदर्शन करते हुए सड़क पर बैठ गए। इससे यातायात प्रभावित हुआ। प्रशासन की ओर से प्रमुख चौक-चौराहों और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था की गई।

लेकिन इस तस्वीर का सबसे बड़ा सवाल सड़क जाम नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड गठन के 26 साल बाद भी आंदोलनकारियों की मांगें सड़क तक क्यों पहुंच रही हैं?
29 सितंबर की मशाल ने बता दिया—गुस्सा अभी बुझा नहीं है
बंद से एक दिन पहले 29 सितंबर की शाम राज्य के विभिन्न हिस्सों में आंदोलनकारियों ने मशाल जुलूस निकालकर अपनी मांगों के समर्थन में लोगों से बंद को समर्थन देने की अपील की। उपलब्ध रिपोर्टों में 30 सितंबर के राज्यव्यापी बंद और 15 नवंबर से आंदोलन तेज करने की चेतावनी की पुष्टि होती है।
मशाल सिर्फ हाथ में जल रही आग नहीं थी।
वह उस सवाल की रोशनी भी थी जिसे झारखंड आंदोलनकारी वर्षों से सरकार के सामने रखते आए हैं।
क्या मांग रहे हैं आंदोलनकारी?
आंदोलनकारी संगठनों की ओर से उठाई जा रही प्रमुख मांगों में—
- जेल जाने की बाध्यता समाप्त करना।
- चिन्हित आंदोलनकारियों को सम्मान पेंशन देना।
- 50 हजार रुपये मासिक सम्मान पेंशन की मांग।
- आंदोलनकारियों के बेटे-बेटियों और आश्रितों के लिए रोजगार/नौकरी की व्यवस्था।
- आंदोलनकारियों को राजकीय सम्मान और अलग पहचान देना।
- लंबित मामलों और आवेदनों का शीघ्र निष्पादन।
- बेहतर चिकित्सा एवं सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं।
- आंदोलनकारी आयोग के कार्यकाल को आगे बढ़ाना।
कुछ संगठनों ने आश्रितों के लिए सरकारी नियुक्तियों में अधिकार, किसानों और विस्थापितों से जुड़े मुद्दे तथा अन्य मांगें भी उठाई हैं। इसलिए मांगों की सूची संगठन के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। 50 हजार रुपये सम्मान पेंशन, आश्रितों को नौकरी और जेल जाने की बाध्यता खत्म करने जैसी मांगें हालिया बैठकों और बंद के आह्वान से जुड़ी रिपोर्टों में भी सामने आई हैं।
असली विवाद सिर्फ पेंशन का नहीं, पहचान का भी है
आंदोलनकारियों की बात को केवल पेंशन की मांग तक सीमित कर देना शायद इस पूरे आंदोलन की तस्वीर नहीं होगी।
उनकी शिकायत का एक बड़ा हिस्सा पहचान और सम्मान से जुड़ा है।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि अलग राज्य के निर्माण के संघर्ष में योगदान देने वालों की पहचान होनी चाहिए और उन्हें सरकारी स्तर पर सम्मान मिलना चाहिए।
यानी सवाल यह भी है—
क्या झारखंड आंदोलन केवल 15 नवंबर 2000 को राज्य बनने के साथ खत्म हो गया था, या उस आंदोलन में शामिल लोगों के अधिकारों और सम्मान का अध्याय भी उसी दिन बंद मान लिया गया?

यही वह प्रश्न है जिसका जवाब आंदोलनकारी आज सड़क पर मांग रहे हैं।
सरकार के आश्वासन और जमीन पर कार्रवाई के बीच कितनी दूरी?
आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि सरकार की ओर से समय-समय पर आश्वासन दिए गए, लेकिन उनकी मांगों का अपेक्षित क्रियान्वयन नहीं हुआ।
30 सितंबर के बंद से पहले राज्य के विभिन्न हिस्सों में हुई बैठकों और मशाल जुलूसों में भी इन्हीं लंबित मांगों को प्रमुखता से उठाया गया।
यहीं से जमीनी आवाज का सवाल शुरू होता है—
अगर मांगें स्वीकार्य नहीं हैं तो सरकार साफ-साफ बताए कि कौन-सी मांग क्यों स्वीकार्य नहीं है।
अगर मांगों पर सरकार सकारात्मक है तो उनकी पूर्ति की समयसीमा क्या है?
और अगर पहले कोई निर्णय या आश्वासन दिया गया था तो वह जमीन पर कब उतरेगा?
क्योंकि लोकतंत्र में आंदोलनकारी को केवल आश्वासन नहीं, स्पष्ट जवाब भी चाहिए।
15 नवंबर की चेतावनी ने आंदोलन को अगले चरण में पहुंचाया
आंदोलनकारी नेताओं ने घोषणा की है कि यदि 30 सितंबर के बंद के बाद भी सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं होती है, तो 15 नवंबर को झारखंड स्थापना दिवस के मौके पर रांची के बिरसा चौक पर आंदोलन का अगला चरण शुरू किया जाएगा।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, मांगें पूरी नहीं होने पर 15 नवंबर से अनिश्चितकालीन आमरण अनशन की चेतावनी दी गई है।
इसका मतलब साफ है—30 सितंबर का बंद आंदोलन का अंतिम पड़ाव नहीं बताया जा रहा, बल्कि इसे आगे की लड़ाई के एक चरण के रूप में देखा जा रहा है।
अब सरकार के सामने सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं
आज रांची में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सड़क पर उतरे लोगों और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, यातायात सामान्य रखे और कानून-व्यवस्था बनाए रखे।
लेकिन सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी इससे कहीं बड़ी है।
सवाल यह नहीं कि आंदोलनकारी सड़क पर क्यों बैठे हैं।

सवाल यह होना चाहिए कि—
वे सड़क पर बैठने को मजबूर क्यों हुए?
कितने आवेदन लंबित हैं?
कितने आंदोलनकारी चिन्हित हैं?
कितनों को पेंशन मिल रही है?
कितने मामलों की जांच या पहचान प्रक्रिया बाकी है?
सरकार ने पूर्व में क्या निर्णय या संकल्प लिए?
उनमें से कितने लागू हुए?
और जो लागू नहीं हुए, उनकी वजह क्या है?
इन सवालों के जवाब आंकड़ों और सरकारी दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
झारखंड की आत्मा से जुड़ा सवाल
झारखंड की पहचान केवल खनिज, जंगल और उद्योग से नहीं है।
यह राज्य उन संघर्षों की जमीन भी है, जहां जल, जंगल, जमीन, पहचान और अधिकार के सवाल उठे।
आज उन्हीं संघर्षों की विरासत का दावा करने वाले लोग अगर 26 साल बाद भी अपने सम्मान और अधिकार के लिए राजधानी की सड़क पर उतर रहे हैं, तो यह तस्वीर सत्ता और समाज—दोनों के लिए विचार का विषय है।
आंदोलनकारियों की हर मांग को स्वतः सही मान लेना समाधान नहीं है और हर मांग को टाल देना भी नहीं।
जरूरत है—मांगों की तथ्यात्मक जांच, पात्रता का पारदर्शी निर्धारण और सरकार के निर्णय की स्पष्ट समयसीमा।
यही लोकतांत्रिक रास्ता है।
जमीनी आवाज का सवाल
झारखंड बनने के 26 साल बाद आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
जिस आंदोलन की बदौलत झारखंड बना, उस आंदोलन के सिपाहियों को अपने ही राज्य में सम्मान और अधिकार के लिए बार-बार सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है?
क्या सरकार इस बार सिर्फ आंदोलन खत्म कराएगी, या उस मूल समस्या का स्थायी समाधान भी करेगी जिसके कारण आंदोलन बार-बार जन्म ले रहा है?
और सबसे अहम—
15 नवंबर को बिरसा चौक पर फिर से आंदोलनकारी जुटें, उससे पहले क्या सरकार उनके सवालों का जवाब दे पाएगी?
झारखंड को इस सवाल का जवाब चाहिए।
क्योंकि आंदोलन का इतिहास किताबों में सुरक्षित हो सकता है, लेकिन आंदोलनकारियों का वर्तमान आज भी सड़कों पर दिखाई दे रहा है।