एक तरफ गोद में तीन साल की मासूम बेटी, दूसरी तरफ गर्भ में पल रहा नया जीवन और बीच में शराब की लत से हिंसा में बदलता वैवाहिक जीवन। बक्सर जिले के एक सुदूर गांव की आठ माह की गर्भवती सुनीता देवी के लिए जिंदगी किसी परीक्षा से कम नहीं थी। पति शराब के नशे में उसके साथ मारपीट करता था। आखिरकार सहनशीलता की सीमा टूटने पर सुनीता ने अपने भाई को अपनी पीड़ा बताई और 22 अगस्त को महिला हेल्पलाइन 181 पोर्टल के माध्यम से सखी वन स्टॉप सेंटर, बक्सर से मदद मांगी।
मदद की पुकार मिलते ही सखी केंद्र ने मामले को गंभीरता से लिया। 24 अगस्त को केंद्र प्रशासक स्वयं सुनीता के ससुराल पहुंचीं। पीड़िता से अलग में बातचीत कर उसकी स्थिति समझी गई। सुनीता ने रोते हुए घरेलू हिंसा और पति की शराब की लत से जुड़ी अपनी पीड़ा सामने रखी।
इसके बाद 25 अगस्त को पति को उसके पिता के साथ सखी केंद्र बुलाकर काउंसलिंग की गई। उसे समझाया गया कि पत्नी, वह भी गर्भावस्था के अंतिम चरण में, के साथ मारपीट न केवल परिवार को तोड़ती है बल्कि कानून की नजर में भी गंभीर मामला है। लंबी काउंसलिंग के बाद पति के व्यवहार में बदलाव के संकेत मिले। उसने शराब छोड़ने और भविष्य में पत्नी के साथ हिंसा नहीं करने का भरोसा दिलाया।
लेकिन सखी केंद्र ने केवल समझौते के बाद मामले को बंद नहीं किया। 21 सितंबर को फॉलो-अप कॉल कर सुनीता का हाल जाना गया। सुनीता ने बताया कि अब परिवार में स्थिति सामान्य है।
25 सितंबर को कहानी ने फिर एक चिंताजनक मोड़ लिया। सुनीता अपने पति और सास के साथ सखी केंद्र पहुंची। सदर अस्पताल में जांच के दौरान चिकित्सकों ने उसका हीमोग्लोबिन बेहद कम पाया था। डॉक्टरों ने तत्काल रक्त चढ़ाने की जरूरत बताई थी। डिलीवरी नजदीक थी और समय पर इलाज नहीं मिलने की स्थिति में मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा पैदा हो सकता था।
गरीब परिवार के सामने इलाज और रक्त की व्यवस्था की बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में सखी वन स्टॉप सेंटर ने फिर पहल की। आवश्यक रिपोर्ट और पत्राचार की प्रक्रिया पूरी करते हुए सुनीता को निःशुल्क इलाज एवं रक्त सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सदर अस्पताल, बक्सर भेजा गया। अस्पताल प्रशासन से समन्वय कर उसकी भर्ती सुनिश्चित कराई गई।
एक महिला की जिंदगी में आए इस संकट में सखी केंद्र की भूमिका केवल एक सरकारी कार्यालय तक सीमित नहीं रही। घरेलू हिंसा से जूझ रही गर्भवती महिला को भावनात्मक सहारा देने से लेकर उसके परिवार को दोबारा जोड़ने और फिर गंभीर स्वास्थ्य संकट में इलाज तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

आज सुनीता स्वस्थ है। परिवार फिर साथ है और पति ने शराब छोड़ने का भरोसा निभाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। सुनीता के शब्द इस पूरी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा हैं—“सखी केंद्र मेरे लिए सरकारी दफ्तर नहीं, मेरा घर है, जिसने मुझे मरने से बचा लिया।”
यह कहानी बताती है कि सही समय पर मिली मदद किसी व्यवस्था को सिर्फ व्यवस्था नहीं रहने देती—वह किसी के लिए जिंदगी का सहारा बन जाती है।