दिल्ली में चुनाव आयोग, मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस विवाद के प्रमुख केंद्र में हैं। विपक्षी दल उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जबकि भाजपा चुनाव आयोग का बचाव करते हुए विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक हमला बता रही है।
25 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर के पास SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान 60 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी। प्रदर्शनकारियों में राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे।
इसके बाद 29 सितंबर को कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने SIR और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

विवाद के बीच 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक से जुड़े विपक्षी दलों की बैठक हुई। बैठक में चुनावी प्रक्रिया, SIR, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर संयुक्त रणनीति पर चर्चा हुई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, भविष्य के चुनावों में पूर्व-SIR मतदाता सूची के इस्तेमाल और बैलेट पेपर से मतदान की मांग रखी।
ज्ञानेश कुमार क्यों बने विवाद का केंद्र?
भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था। निर्वाचन आयोग स्वयं को चुनाव प्रक्रिया संचालित करने वाला स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण बताता है।

SIR को लेकर बढ़े राजनीतिक विवाद के बीच आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पर बहस तेज हुई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में कथित हेरफेर और नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित नहीं माना जाना चाहिए।
यानी इस पूरे विवाद में आरोप और जवाब दोनों सामने हैं। विपक्ष चुनावी पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा और निर्वाचन आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते।

सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार का नहीं, चुनावी भरोसे का भी
SIR को लेकर विवाद अब केवल किसी एक अधिकारी या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार की प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जुड़ गया है।

क्या किसी पात्र मतदाता का नाम हटने की स्थिति में उसे पर्याप्त जानकारी और अपील का अवसर मिलता है?
मतदाता सूची में बदलाव का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से कितना उपलब्ध है?
और क्या चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों तथा आम मतदाताओं के बीच भरोसा कायम रखने के लिए पर्याप्त जानकारी दी जा रही है?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब चुनाव आयोग की प्रक्रिया और उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से ही तय किया जा सकता है।
विपक्ष की संयुक्त रणनीति
30 सितंबर की बैठक ने इस विवाद को एक नए राजनीतिक चरण में पहुंचाया है। विपक्षी दल अब अलग-अलग बयान देने के बजाय संयुक्त कार्रवाई और आंदोलन की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। बैठक में चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों को लेकर आगे की रणनीति पर सहमति बनाने की कोशिश की गई।
दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा नेता स्मृति ईरानी ने SIR को लेकर कांग्रेस के सवालों पर पलटवार करते हुए पूछा कि विपक्ष गलत या डुप्लीकेट मतदाताओं के नामों को लेकर चिंता क्यों नहीं कर रहा।
यानी फिलहाल देश के सामने दो अलग राजनीतिक दावे हैं। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक अभियान के रूप में देख रही है।
मोदी-शाह के इस्तीफे की मांग तक पहुंचा विवाद
29 सितंबर को कांग्रेस कार्यसमिति ने CEC ज्ञानेश कुमार के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की भी मांग की। कांग्रेस ने SIR को स्थगित करने और मतदाता सूची से हटाए गए नामों को बहाल करने की मांग भी उठाई।
हालांकि, सरकार पर किसी तत्काल राजनीतिक संकट या नेतृत्व परिवर्तन की पुष्टि करने वाली कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं है। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन जैसी चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों से आगे तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
जमीनी आवाज का सवाल
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल किसी एक नेता या पार्टी का नहीं, बल्कि मतदाता के अधिकार का है।
क्या हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है?
क्या नाम हटाए जाने की स्थिति में मतदाता को पर्याप्त सूचना और अपील का अवसर मिलेगा?
क्या चुनाव आयोग अपनी प्रक्रियाओं और आंकड़ों को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा?
और सबसे अहम—क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव के बीच आम मतदाता का चुनावी व्यवस्था पर भरोसा कायम रहेगा?
भारत निर्वाचन आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर मतदाता अपना नाम खोजने, SIR से संबंधित जानकारी देखने, आवेदन की स्थिति जांचने और शिकायत या अपील दर्ज करने जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
सरकार बदलेगी या नहीं, नेतृत्व में बदलाव होगा या नहीं—इन सवालों का फैसला राजनीतिक अटकलों से नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होगा।
लेकिन मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का पारदर्शी जवाब देना लोकतांत्रिक भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है।
जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—
चुनाव में असली ताकत किसी पार्टी कार्यालय में नहीं, मतदाता की उंगली पर लगी स्याही में होती है।