CCL की मगध परियोजना में टायर ब्लास्टिंग के दौरान हुए दर्दनाक हादसे में एक कर्मी की मौत ने खदानों में मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में 40 वर्षीय रविंद्र नाथ महतो, निवासी बेनोसोली, पूर्वी सिंहभूम की जान चली गई। घटना के बाद परिजनों में मातम है, वहीं मुआवजे और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल तेज हो गए हैं।
बताया गया कि सोमवार की रात करीब 8 बजे टायर ब्लास्टिंग के दौरान यह हादसा हुआ, जिसमें रविंद्र नाथ महतो गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी मौत हो गई। बालूमाथ पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर आवश्यक कार्रवाई शुरू की।
मुआवजे को लेकर JLKM और CCL प्रबंधन के बीच बातचीत
हादसे के बाद मुआवजे को लेकर JLKM लातेहार जिलाध्यक्ष निशांत यादव ने CCL प्रबंधन के साथ बातचीत की। मामला आगे बढ़ने पर JLKM के केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष देवेंद्रनाथ महतो ने परियोजना पदाधिकारी राकेश सिंह से फोन पर बातचीत की।
बातचीत के दौरान मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता और उनकी पत्नी के लिए मासिक पेंशन को लेकर सहमति बनी।
सहमति के अनुसार मृतक के परिजनों को ₹12 लाख तत्काल और ₹8 लाख 40 दिनों के भीतर, यानी कुल ₹20 लाख देने तथा मृतक की पत्नी को ₹11 हजार प्रतिमाह पेंशन देने की बात सामने आई है।
मुआवजा मिला, लेकिन सुरक्षा की जवाबदेही कौन लेगा?
मुआवजे पर सहमति के बाद परिवार को आर्थिक राहत जरूर मिलेगी, लेकिन हादसे ने खदानों में मजदूरों की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या किसी मजदूर की जान जाने के बाद मुआवजा देना ही सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी कर देता है?
खदानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए सुरक्षा मानकों और ब्लास्टिंग प्रक्रिया की निगरानी कितनी प्रभावी है? हादसे के पीछे आखिर क्या वजह रही? क्या घटना की जिम्मेदारी तय होगी? क्या जांच केवल कागजों तक सीमित रहेगी या सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक बदलाव भी होगा?

एक मौत, कई सवाल
रविंद्र नाथ महतो की मौत सिर्फ एक परिवार के लिए कमाने वाले सदस्य का चले जाना नहीं है। यह उन तमाम मजदूरों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है, जो रोजाना खदानों में जोखिम उठाकर काम करते हैं।
मुआवजा किसी परिवार को तत्काल आर्थिक सहारा दे सकता है, लेकिन वह मृतक की जिंदगी वापस नहीं ला सकता। इसलिए हादसे के कारणों की जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।
जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—
मजदूर की मौत के बाद उसके परिवार को मुआवजा मिलना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि अगली बार किसी दूसरे परिवार को अपने कमाने वाले सदस्य की तस्वीर लेकर मुआवजे के लिए दर-दर न भटकना पड़े।
हादसे की निष्पक्ष जांच, सुरक्षा मानकों की समीक्षा और जिम्मेदारी तय करना अब सिर्फ प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि मजदूरों के जीवन से जुड़ा गंभीर सवाल है।