मंच पर व्यंग्य, सियासत में बवाल
कभी-कभी मंच पर किया गया व्यंग्य सिर्फ हंसी पैदा नहीं करता, बल्कि वह सवाल छोड़ जाता है। इंदौर में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री करने वाले युवा कलाकार की प्रस्तुति के बाद उठे विवाद को भी इसी नजर से देखने की जरूरत है।
मिमिक्री करने वाले युवा ने प्रधानमंत्री मोदी की आवाज, अंदाज और संवाद शैली की नकल करते हुए अपनी प्रस्तुति को एक अलग राजनीतिक व्यंग्य का रूप दिया। प्रस्तुति के अंत में 'लवणेन भोज्यम्' कहते हुए उसने अपनी बात खत्म की, जिसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस तेज हो गई।
भाजपा की ओर से इस प्रस्तुति को प्रधानमंत्री की मां के अपमान से जोड़कर सवाल उठाए गए, वहीं दूसरी ओर इसे सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था पर किया गया व्यंग्य बताया गया।
क्या हर व्यंग्य अपमान है?
लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने के कई तरीके होते हैं—भाषण, लेख, प्रदर्शन या मिमिक्री। मिमिक्री का उद्देश्य किसी सार्वजनिक व्यक्ति के अंदाज की नकल करके उसके राजनीतिक व्यक्तित्व पर टिप्पणी करना होता है। इस प्रस्तुति को पसंद या नापसंद किया जा सकता है, उसकी भाषा और मर्यादा पर बहस हो सकती है, लेकिन उसके पीछे उठाए गए सवालों को केवल हंसी या अपमान के खांचे में डाल देना पर्याप्त नहीं है।
मां सिर्फ राजनीति का शब्द नहीं
देश में वह मां भी है जो बेटे की नौकरी का इंतजार करते-करते बूढ़ी हो रही है, जिसका बेटा रोजगार न मिलने की चिंता में टूट रहा है, जो घर की आर्थिक हालत खराब होने के बावजूद बच्चे की पढ़ाई जारी रखने के लिए अपनी जरूरतें छोड़ देती है। सवाल यह है कि अगर व्यंग्य में 'मां' का जिक्र आता है, तो बहस सिर्फ इस पर होनी चाहिए कि किसकी मां का अपमान हुआ—या उन तमाम मांओं की पीड़ा पर भी होनी चाहिए जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष कर रही हैं?
सत्ता से सवाल करना कब असम्मान बन गया?
सत्ता में बैठा कोई भी व्यक्ति आलोचना से ऊपर नहीं हो सकता। व्यक्तिगत अपमान और राजनीतिक व्यंग्य के बीच अंतर पर बहस हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि सत्ता से सवाल पूछने की जगह बची रहे।
'लवणेन भोज्यम्' के बाद...
मंच पर मिमिक्री खत्म हो गई, शब्द खत्म हो गए, हंसी खत्म हो गई—लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ। वह सवाल उन युवाओं के बीच रह गया जो रोजगार और भविष्य को लेकर चिंतित हैं, उन परिवारों के बीच जो महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं, और सबसे ज्यादा उन मांओं के बीच जो अपने बच्चों के लिए आज भी अपना सब कुछ न्योछावर कर रही हैं।
इसलिए इंदौर की इस घटना को सिर्फ 'मां का अपमान' बनाम 'मिमिक्री' के विवाद में सीमित कर देना शायद उस व्यंग्य के पीछे उठे बड़े सवालों को छोटा कर देगा। व्यंग्य की मर्यादा पर बहस होनी चाहिए, राजनीतिक भाषा पर बहस होनी चाहिए, लेकिन बेरोजगारी, युवाओं की चिंता और परिवारों की आर्थिक परेशानियों पर भी उतनी ही गंभीर बहस होनी चाहिए।
'लवणेन भोज्यम्' कहकर कलाकार मंच से उतर गया, लेकिन सत्ता के सामने आईना छोड़ गया। अब यह सत्ता पर है कि वह आईना तोड़ेगी या उसमें अपना चेहरा देखेगी।





