नामांकन वापसी से शुरू हुआ नया सियासी मोड़

पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में है। 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव से पहले जिस सीट पर मुकाबला पहले ही रोचक था, वहां पिछले कुछ दिनों में घटनाक्रम ने चुनावी लड़ाई को और दिलचस्प बना दिया है।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने पहले संचिता प्रधान डे को नंदीग्राम से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन 18 सितंबर को संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की।

इसके कुछ ही घंटे बाद कहानी ने एक और मोड़ ले लिया। कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि-अधिग्रहण आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों में गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत ने उन्हें 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, गिरफ्तारी उन्हें चुनाव लड़ने से स्वतः अयोग्य नहीं बनाती, लेकिन हिरासत में रहने के कारण उनके लिए सीधे चुनाव प्रचार करना संभव नहीं है।

अब मैदान में पत्नी, जेल से प्रत्याशी

ऐसे में नंदीग्राम की चुनावी लड़ाई का एक असामान्य दृश्य सामने आया है—उम्मीदवार जेल में है और चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी परिवार के कंधों पर आ गई है। स्थानीय स्तर पर हो रही चर्चाओं में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या मतदाता इस घटनाक्रम को केवल कानूनी मामला मानेंगे या इसे चुनावी मुद्दे के रूप में भी देखेंगे?

ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन दिए जाने के बाद मुकाबले का राजनीतिक गणित भी बदला है। यह समर्थन किस हद तक चुनावी असर डालता है, इसका फैसला अंततः नंदीग्राम के मतदाता ही करेंगे।

चाय की दुकानों से चौक-चौराहों तक एक ही सवाल

जमीनी स्तर से मिल रही चर्चाओं में एक बात साफ दिखाई देती है—नंदीग्राम में चुनाव अब सिर्फ उम्मीदवारों का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक घटनाक्रमों और जनता की धारणा के बीच भी लड़ाई बनता जा रहा है।

चाय की दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक केंद्र सरकार की नीतियों और आरोप-प्रत्यारोप को लेकर भी बहस हो रही है। कुछ लोगों का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में जनता बदलाव के सवाल पर गंभीरता से विचार कर रही है, जबकि दूसरे मतदाता स्थानीय नेतृत्व और नंदीग्राम के अपने राजनीतिक समीकरणों को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। इसी चर्चा में भाजपा को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आ रही है।

नंदीग्राम का फैसला अब जनता के हाथ में

एक तरफ कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान जेल में हैं, दूसरी तरफ उनकी पत्नी अर्पिता प्रधान के चुनावी मैदान संभालने की चर्चा है। वहीं ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देकर इस मुकाबले को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।

अब असली सवाल यही है—क्या जेल में बंद प्रत्याशी के नाम पर उनकी पत्नी जनता के बीच सहानुभूति और समर्थन जुटा पाएंगी? क्या ममता बनर्जी का समर्थन कांग्रेस के पक्ष में जमीन पर वोट में बदल पाएगा? क्या भाजपा नंदीग्राम में अपना राजनीतिक प्रभाव कायम रख पाएगी? या फिर नंदीग्राम की जनता इस बार अपने वोट से ऐसा संदेश देगी जिसकी चर्चा पूरे बंगाल में होगी?

इन सवालों का जवाब 6 अक्टूबर को मतदान के बाद ही मिलेगा। फिलहाल नंदीग्राम में राजनीतिक तापमान बढ़ चुका है और हर चौक-चौराहे की चर्चा अगले राजनीतिक संदेश की तलाश में है।