जमीनी आवाज | विशेष रिपोर्ट


चाईबासा | असित भट्टाचार्य

कोल्हान विश्वविद्यालय में गुरुजनों की पीड़ा: जिन्होंने संवारा संस्थान, आज वही न्याय के लिए धरने को मजबूर!

अप्रैल में मिला समाधान का आश्वासन, सितंबर में फिर सौंपा आवेदन; पेंशन और लंबित देय लाभों को लेकर 26 अक्टूबर को धरने की तैयारी

जिन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नींव मजबूत की, आज उन्हीं की मांगों पर कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल; सेवानिवृत्त शिक्षक संघ ने कुलपति को पत्र लिखकर जताई नाराजगी

चाईबासा: किसी भी विश्वविद्यालय की असली पहचान उसकी इमारतों, कार्यालयों और परीक्षाओं से नहीं, बल्कि उन शिक्षकों से होती है, जो पीढ़ियों को शिक्षित कर संस्थान की प्रतिष्ठा गढ़ते हैं। लेकिन जब उन्हीं शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी मांगों को लेकर धरने का रास्ता चुनना पड़े, तो सवाल केवल लंबित भुगतान का नहीं, बल्कि संस्थागत संवेदनशीलता और सम्मान का भी बन जाता है।

कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा से जुड़ा ऐसा ही मामला सामने आया है। कोल्हान सेवानिवृत्त शिक्षक संघ ने कुलपति को पत्र लिखकर 26 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय परिसर में शांतिपूर्ण धरना देने का निर्णय बताया है। प्रस्तावित कार्यक्रम का समय सुबह 11:30 बजे से शाम 4 बजे तक निर्धारित किया गया है। संघ ने इसके लिए अनुमति भी मांगी है।

संघ ने अपने पत्र में कथित उपेक्षा, अपमानजनक व्यवहार, लंबित मांगों और पूर्व में मिले आश्वासन के अनुरूप कार्रवाई नहीं होने पर गंभीर आपत्ति जताई है। पेंशन, भुगतान और अन्य देय लाभों से जुड़े मामलों को लेकर संघ की नाराजगी अब सार्वजनिक विरोध की तैयारी तक पहुंच गई है।

हालांकि, संघ के आरोपों पर विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है। उसके बिना मामले के सभी पहलुओं का निष्पक्ष आकलन नहीं किया जा सकता।

अप्रैल में आश्वासन, सितंबर में फिर आवेदन; आखिर क्यों नहीं निकला समाधान?

संघ के पत्र के अनुसार, सेवानिवृत्त शिक्षकों की शिकायतें नई नहीं हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए वे पहले भी विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क कर चुके हैं।

21 अप्रैल 2026: संघ का एक शिष्टमंडल कुलपति कार्यालय पहुंचा और अपनी मांगों से संबंधित प्रतिवेदन सौंपा। संघ के मुताबिक, उस दौरान कुलपति की ओर से सकारात्मक व्यवहार और समस्याओं के समाधान का आश्वासन मिला था।

इसके बाद: संघ का आरोप है कि आश्वासन के अनुरूप अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। अपनी समस्याओं को लेकर दोबारा संपर्क करने की कोशिशों के बावजूद उन्हें संतोषजनक परिणाम नहीं मिला।

14 सितंबर 2026: संघ ने फिर आवेदन देकर अपनी लंबित मांगों और समस्याओं की ओर विश्वविद्यालय प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया।

लेकिन संघ के अनुसार, इस प्रयास के बाद भी अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। पत्र में बुजुर्ग शिक्षकों को अपनी बात रखने में हो रही कठिनाइयों और संवाद की कमी पर नाराजगी व्यक्त की गई है।

इन घटनाक्रमों के बाद संघ ने धरने का निर्णय लिया है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि जब समस्याओं के समाधान के लिए पहले भी आवेदन दिए गए और आश्वासन मिलने की बात कही गई, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला धरने तक पहुंच गया? क्या लंबित मांगों की समीक्षा के लिए कोई ठोस प्रक्रिया शुरू हुई? यदि हुई, तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?

इन सवालों का जवाब विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद ही मिल सकेगा।

'शरीर से क्लान्त हैं, लेकिन अपनी पीड़ा कहने का अधिकार नहीं छोड़ेंगे'

कुलपति को भेजे गए पत्र में संघ ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखा है—

“हम कोल्हान वि.वि. के सेवा निवृत्त शिक्षक हैं। होती अवहेलना, उपेक्षा और होते अपमानजनक व्यवहार के प्रति अपनी गंभीर आपत्ति प्रकट करते हैं। हम शरीर से क्लान्त, अशक्त और निर्बल हैं, तथापि हमारा सामान्य बोध अपने 'कुल' के व्यवहार से निरन्तर हो रही पीड़ा से व्यथित है और अधीर भी।”

पत्र की यह अभिव्यक्ति बताती है कि संघ अपनी शिकायत को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं मान रहा, बल्कि इसे सम्मान और संवाद से जुड़ा विषय भी बता रहा है।

जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष शिक्षा और विद्यार्थियों के भविष्य को समर्पित करने वाले शिक्षकों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा और सम्मान दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि उन्हें अपनी समस्याओं को लेकर बार-बार आवेदन देना पड़े और फिर भी समाधान की स्पष्ट स्थिति सामने न आए, तो उनकी नाराजगी स्वाभाविक रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है।

संघ ने अपने पत्र में आगे लिखा है—

“हम अपने हाल में नारे नहीं लगा सकते, जुलूस नहीं निकाल सकते, किन्तु एतराज कर सकते हैं।”

यह पंक्ति प्रस्तावित धरने के पीछे की भावना को सामने लाती है। संघ के सदस्य अपनी उम्र और शारीरिक सीमाओं का उल्लेख करते हुए भी अपनी बात रखने के अधिकार पर जोर दे रहे हैं।

पत्र में यह भी कहा गया है—

“बेशक, बूढ़े आन्दोलन की राह चलें, यह असाधारण घटना होगी। अपने ही 'कुल' के प्रति अपनी वेदना व्यक्त करने के लिए हम किन्तु अभिशप्त हैं।”

इन शब्दों में विश्वविद्यालय के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे शिक्षकों की पीड़ा और संस्थान से उनकी अपेक्षाएं झलकती हैं।

पेंशन और लंबित देय लाभ: आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा सवाल

सेवानिवृत्त शिक्षकों की नाराजगी का एक प्रमुख पहलू पेंशन, भुगतान और अन्य देय लाभों से जुड़ा है।

संघ के पत्र के अनुसार, उसकी मांगें लंबे समय से लंबित हैं और पूर्व में मिले आश्वासनों के बावजूद अपेक्षित समाधान नहीं हो पाया है। इसी कारण संघ ने आंदोलन का रास्ता चुनने का निर्णय लिया है।

सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और अन्य देय लाभ किसी कर्मचारी की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। यदि इनसे संबंधित भुगतान लंबित हों, तो संबंधित लोगों को आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

लेकिन इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां अभी स्पष्ट होनी बाकी हैं।

कौन-कौन से भुगतान लंबित हैं? प्रत्येक मामले में कितनी राशि बकाया है? कितने सेवानिवृत्त शिक्षक प्रभावित हैं? किन मांगों का समाधान विश्वविद्यालय स्तर पर संभव है और किनके लिए अन्य विभागों की मंजूरी आवश्यक है?

इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी सामने आने से विवाद की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

जमीनी आवाज का सवाल है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन लंबित मामलों का ब्योरा सार्वजनिक करते हुए उनके समाधान के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करेगा?

यदि किसी मांग के निपटारे में प्रशासनिक, वित्तीय या कानूनी अड़चन है, तो संबंधित शिक्षकों को उसकी स्थिति से अवगत कराना और उनके साथ संवाद बनाए रखना भी जरूरी है।

26 अक्टूबर को प्रस्तावित धरना: क्या उससे पहले होगी बातचीत?

कोल्हान सेवानिवृत्त शिक्षक संघ ने 26 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:30 बजे से शाम 4 बजे तक विश्वविद्यालय परिसर में शांतिपूर्ण धरना देने की घोषणा की है। संघ ने इसके लिए अनुमति मांगी है।

पत्र की प्रतिलिपि राज्यपाल, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव, विश्वविद्यालय के कुलसचिव और पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को भी भेजे जाने की बात कही गई है।

इससे संकेत मिलता है कि संघ अपनी शिकायत को संबंधित उच्च पदाधिकारियों के संज्ञान में भी लाना चाहता है।

अब निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन की अगली पहल पर हैं।

क्या धरने की प्रस्तावित तारीख से पहले संघ के प्रतिनिधियों के साथ बैठक होगी? क्या लंबित मांगों की समीक्षा कर समाधान की समयसीमा तय की जाएगी? क्या शिक्षकों को उनके भुगतान और अन्य देय लाभों की स्थिति स्पष्ट रूप से बताई जाएगी?

या फिर अपनी बात सुनवाने के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों को 26 अक्टूबर को विश्वविद्यालय परिसर में धरना देना पड़ेगा?

इन सवालों का जवाब विश्वविद्यालय प्रशासन की पहल और उसके आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट होगा।

जमीनी आवाज का बड़ा सवाल: जिन शिक्षकों ने संस्थान बनाया, उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए धरने तक क्यों पहुंचना पड़े?

विश्वविद्यालय केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं होता। वह शिक्षकों के ज्ञान, विद्यार्थियों के परिश्रम और वर्षों में विकसित हुई शैक्षणिक परंपराओं से अपनी पहचान बनाता है।

जिन शिक्षकों ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा विद्यार्थियों को शिक्षित करने और संस्थान को मजबूत बनाने में लगाया, उनके प्रति सम्मान और उनकी जायज मांगों का समय पर समाधान किसी भी शैक्षणिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

कोल्हान सेवानिवृत्त शिक्षक संघ की शिकायतों और आरोपों की पूरी तस्वीर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष, लंबित मामलों का विवरण और संबंधित अभिलेख सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। लेकिन संघ की ओर से धरने की घोषणा अपने आप में ऐसा घटनाक्रम है, जिस पर विश्वविद्यालय प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

यह मामला केवल एक संगठन के विरोध कार्यक्रम का नहीं, बल्कि संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी का भी है।

यदि लंबित मांगों पर बातचीत शुरू होती है, उनकी स्थिति स्पष्ट की जाती है और समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो प्रस्तावित धरने से पहले ही सकारात्मक रास्ता निकल सकता है।

आखिरकार, सवाल किसी एक पदाधिकारी या संगठन की प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि उस विश्वविद्यालय की गरिमा का है, जिसकी पहचान उसके शिक्षक और उनकी शैक्षणिक विरासत से बनती है।

जमीनी आवाज की नजर इस मामले पर बनी रहेगी।