जमीनी आवाज | विशेष रिपोर्ट

स्थान : सरायकेला-चांडिल | रिपोर्टर : विजय कुमार गोप

चांडिल के विस्थापितों की दोटूक: पहले कार्यकाल का हिसाब दीजिए, फिर आंदोलन की बात कीजिए!

116 गांवों के 19,115 परिवारों के नाम पर राजनीति क्यों? सत्ता और विभागीय जिम्मेदारी में रहते हुए क्या किया, नेताओं को देना होगा जवाब

“हमें किसी नेता की बैसाखी नहीं चाहिए, अपने हक की लड़ाई हम खुद लड़ेंगे”—विस्थापितों का सवाल: जब फैसले लेने का अवसर था, तब स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ?

सरायकेला-चांडिल। चांडिल बांध के विस्थापन का दर्द दशकों पुराना है, लेकिन प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और अधिकारों से जुड़े सवाल आज भी चर्चा में हैं। लंबे समय से अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे विस्थापितों के बीच अब राजनीतिक जवाबदेही का सवाल प्रमुखता से उठ रहा है। उनकी निगाह उन नेताओं के पुराने कार्यकालों पर है, जिनके पास अलग-अलग समय में झारखंड के जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी रही।

विस्थापितों की मांग का सार स्पष्ट है—पहले हिसाब, फिर आंदोलन; पहले अधिकारों पर जवाब, फिर राजनीति!

उनका सवाल है कि जब नेताओं के पास सत्ता में रहने और विभागीय फैसले लेने का अवसर था, तब चांडिल बांध से प्रभावित परिवारों की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए? कितने परिवारों को पुनर्वास का पूरा लाभ मिला? कितने परिवारों को मुआवजा मिला और कितने मामलों का समाधान अब भी बाकी है?

प्रभावित परिवारों की नाराजगी केवल अधूरे आश्वासनों को लेकर नहीं है। वे चाहते हैं कि राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों के दावों की तुलना सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति से की जाए। उनके मुताबिक, विस्थापन का मुद्दा केवल राजनीतिक सक्रियता के समय चर्चा में आने के बजाय लगातार प्राथमिकता में रहना चाहिए।

सुदेश महतो से सवाल: उपमुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री रहते क्या हुआ?

विस्थापितों के सवाल आजसू पार्टी प्रमुख सुदेश कुमार महतो के कार्यकाल को लेकर भी हैं। अक्टूबर 2010 से जनवरी 2013 के बीच अर्जुन मुंडा सरकार में उपमुख्यमंत्री और जल संसाधन विभाग के मंत्री के रूप में उनकी भूमिका रही थी।

प्रभावित परिवार जानना चाहते हैं कि इस अवधि में चांडिल बांध विस्थापितों के पुनर्वास और मुआवजे के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए? पुनर्वास नीति के क्रियान्वयन की दिशा में क्या निर्णय हुए? कितने परिवारों को वास्तविक लाभ मिला और कितने परिवारों की समस्याएं अनसुलझी रहीं?

यदि उस कार्यकाल में विस्थापितों के हित में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए थे, तो उनके विवरण और परिणाम सार्वजनिक होने चाहिए। विस्थापन जैसे गंभीर विषय पर केवल राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं हैं। प्रभावित परिवारों को यह जानने का अधिकार है कि उनके पुनर्वास के लिए क्या निर्णय लिए गए और उनका जमीन पर कितना असर पड़ा।

यह सवाल किसी पूर्व मंत्री को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी निभाने के दौरान किए गए कामों और उनके परिणामों की जानकारी मांगने का है। इसका स्पष्ट जवाब विभागीय दस्तावेजों और सत्यापित आंकड़ों से ही मिल सकता है।

चंद्रप्रकाश चौधरी से सवाल: साढ़े चार साल के कार्यकाल में कितनी प्रगति हुई?

विस्थापितों के सवाल पूर्व जल संसाधन मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी के कार्यकाल को लेकर भी हैं। फरवरी 2015 से जून 2019 तक रघुवर दास सरकार में विभाग की जिम्मेदारी संभालने के दौरान चांडिल बांध से प्रभावित परिवारों के लिए क्या ठोस काम किए गए?

कितने परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ी? मुआवजे से जुड़े कितने मामलों का निपटारा हुआ? कितने प्रभावित परिवारों को उनके अधिकार मिले और किन समस्याओं का समाधान उस अवधि में नहीं हो सका?

विस्थापितों की मांग है कि इन सवालों के जवाब आंकड़ों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर दिए जाएं। दशकों से अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे परिवार अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि यह जानना चाहते हैं कि नीतियों और घोषणाओं से उनकी जिंदगी में क्या बदलाव आया।

सवाल सीधा है—यदि समस्याओं के समाधान के लिए विभागीय जिम्मेदारी और निर्णय लेने का अवसर उपलब्ध था, तो पुनर्वास और मुआवजे से जुड़े सवाल आज भी क्यों उठ रहे हैं?

इन सवालों पर संबंधित पूर्व मंत्री और विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है, ताकि उपलब्धियों, सीमाओं और लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

रामचंद्र सहिस के कार्यकाल का भी मांगा जा रहा हिसाब

जुगसलाई के पूर्व विधायक रामचंद्र सहिस ने जून 2019 में जल संसाधन मंत्री का पदभार संभाला था। उनके कार्यकाल से संबंधित उपलब्ध जानकारी में चांडिल बांध से प्रभावित 116 गांवों के 19,115 परिवारों को विस्थापित के रूप में चिह्नित किए जाने और पुनर्वास नीति-2012 के तहत 14,400 परिवारों को विकास पुस्तिका जारी किए जाने का उल्लेख मिलता है।

लेकिन विस्थापितों के लिए सवाल केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के पीछे छूटे परिवारों और उनके वास्तविक अधिकारों का है।

यदि 14,400 परिवारों को विकास पुस्तिकाएं जारी की गई थीं, तो उसके बाद पुनर्वास और अन्य सुविधाओं की दिशा में कितनी प्रगति हुई? कितने परिवारों को वास्तविक लाभ मिला? कितने मामले लंबित रहे? शेष प्रभावित परिवारों की स्थिति क्या है?

विस्थापितों का कहना है कि विकास पुस्तिका जारी होना और किसी परिवार को उसके अधिकारों का वास्तविक लाभ मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए सरकार और संबंधित जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट करना चाहिए कि दस्तावेज जारी होने के बाद जमीन पर क्या बदलाव आया।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—विकास पुस्तिका जारी किए जाने का आंकड़ा अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि संबंधित सभी परिवारों का पुनर्वास पूरा हो गया या उन्हें सभी निर्धारित सुविधाएं मिल गईं। इसकी पुष्टि के लिए विभागीय रिकॉर्ड, लाभार्थियों की वर्तमान स्थिति और लंबित मामलों का विवरण आवश्यक है।

इसीलिए विस्थापितों की मांग है कि आंकड़ों को केवल उपलब्धि के रूप में पेश करने के बजाय उनके वास्तविक परिणाम भी सार्वजनिक किए जाएं।

ईचागढ़ की राजनीति के बीच विस्थापन का मुद्दा फिर चर्चा में

चांडिल बांध विस्थापितों के मुद्दे पर आजसू की ओर से आंदोलन तेज करने की बात के बीच राजनीतिक समय और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

प्रभावित परिवार जानना चाहते हैं कि विस्थापन की समस्या को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता केवल बैठकों और आंदोलनों तक सीमित रहेगी या पुनर्वास, मुआवजे और आजीविका से जुड़े लंबित मामलों के समाधान के लिए ठोस पहल भी होगी।

उनका सवाल है कि यदि विस्थापितों की समस्याएं वास्तव में प्राथमिकता थीं, तो सत्ता में रहते हुए उनके स्थायी समाधान के लिए क्या प्रयास किए गए? और यदि उस समय कुछ कारणों से समाधान संभव नहीं हो सका, तो उन कारणों की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए?

यह सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। चांडिल बांध विस्थापन से जुड़े मुद्दे पर जिन सरकारों, जनप्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी रही है, उनकी भूमिका और निर्णयों की समीक्षा तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

विस्थापितों को यह जानने का अधिकार है कि किस सरकार ने क्या निर्णय लिया, कौन-सी योजनाएं बनीं, कितनी लागू हुईं और किन समस्याओं का समाधान अब भी बाकी है।

राजनीतिक दलों के लिए भी यह अवसर है कि वे अपने पुराने कार्यकालों का रिकॉर्ड सामने रखें और बताएं कि आगे की लड़ाई में उनके पास केवल आंदोलन का आह्वान है या समाधान की कोई स्पष्ट कार्ययोजना भी है।

“हमें किसी नेता की बैसाखी नहीं चाहिए”

चांडिल के विस्थापितों का सबसे स्पष्ट संदेश राजनीतिक नेतृत्व को लेकर है। उनका कहना है कि वे अपने अधिकारों की लड़ाई को किसी नेता या पार्टी की कृपा पर निर्भर नहीं रखना चाहते।

हरलाल महतो, सविता महतो और रामचंद्र सहिस जैसे नेताओं की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी विस्थापितों के बीच सवाल उठ रहे हैं। प्रभावित परिवारों का संदेश है कि कोई भी नेता उनके संघर्ष में साथ देना चाहता है, तो उसका स्वागत है। लेकिन उनके मुद्दों पर राजनीति करने से पहले उसे अपनी भूमिका और उपलब्धियों का हिसाब भी देना चाहिए।

विस्थापितों का कहना है कि चांडिल बांध से प्रभावित परिवार कोई राजनीतिक मोहरा नहीं हैं। उन्होंने वर्षों तक विस्थापन का दर्द झेला है और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। इसलिए उनकी समस्याओं को किसी दल के राजनीतिक या चुनावी एजेंडे तक सीमित नहीं किया जा सकता।

उनकी मांग का सार यही है—हमारे संघर्ष में साथ आइए, लेकिन हमारे अधिकारों को राजनीति का साधन मत बनाइए।

उनके मुताबिक, उनकी लड़ाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है, जहां प्रभावित परिवारों की समस्याएं लंबे समय तक लंबित रह सकती हैं। जो भी ईमानदारी से उनके अधिकारों के लिए खड़ा होगा, उसका स्वागत किया जाएगा। लेकिन सत्ता में रहते हुए किए गए कामों और लिए गए फैसलों पर सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।

116 गांव, 19,115 परिवार और दशकों का इंतजार: जवाबदेही से ही निकलेगा रास्ता

चांडिल बांध विस्थापन का सवाल केवल पुनर्वास या मुआवजे तक सीमित नहीं है। यह हजारों परिवारों के भविष्य, सम्मान और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है।

116 गांवों के 19,115 परिवारों से संबंधित आंकड़े समस्या के व्यापक दायरे की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि प्रभावित परिवारों की वर्तमान स्थिति का पारदर्शी आकलन हो। कितने परिवारों का पुनर्वास पूरा हुआ, कितनों को मुआवजा मिला, कितने मामले लंबित हैं और किन परिवारों को अब भी सरकारी सहायता की जरूरत है—इन सभी सवालों पर स्पष्ट और सत्यापित जानकारी सामने आनी चाहिए।

राजनीतिक दलों को अपने दावों के साथ यह भी बताना चाहिए कि उनके कार्यकाल में कौन-से निर्णय लिए गए और उनसे प्रभावित परिवारों को कितना लाभ मिला। वहीं, वर्तमान सरकार और संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है कि लंबित मामलों की स्थिति सार्वजनिक करे और समाधान के लिए समयबद्ध कार्ययोजना सामने रखे।

विस्थापन का दर्द भाषणों से कम नहीं होता। उसका समाधान तभी संभव है, जब सरकारी रिकॉर्ड, पुनर्वास नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी कम हो। इसके लिए पारदर्शी आंकड़े, समयबद्ध कार्रवाई और प्रभावित परिवारों की भागीदारी जरूरी है।

जमीनी आवाज का सवाल: विस्थापितों को भाषण नहीं, जवाब चाहिए!

चांडिल के विस्थापितों की मांग को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल है।

यदि किसी नेता के पास कभी जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी रही है, तो उसके कार्यकाल में लिए गए फैसलों और हासिल परिणामों की जानकारी सामने आनी चाहिए। यदि किसी सरकार ने पुनर्वास के लिए कदम उठाए, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनका लाभ किन परिवारों तक पहुंचा। और यदि प्रभावित परिवार अब भी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो उनके समाधान की जिम्मेदारी कौन लेगा?

विस्थापितों का संघर्ष किसी दल की राजनीतिक सुविधा से बड़ा है। उनका अधिकार किसी चुनावी वादे का विषय भर नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही का सवाल है।

अब सवाल केवल यह नहीं है कि चांडिल के विस्थापितों के लिए कौन आंदोलन करेगा। असली सवाल यह भी है कि जिनके पास पहले अवसर था, उन्होंने क्या किया और जिनके पास आज जिम्मेदारी है, वे आगे क्या करेंगे?

चांडिल के विस्थापितों का संदेश सत्ता, विपक्ष और सभी राजनीतिक दलों के लिए साफ है—उनके दर्द को राजनीति का मुद्दा बनाने से पहले उनके सवालों का जवाब दीजिए। उनके अधिकारों की बात करने से पहले उनके संघर्ष को समझिए।

क्योंकि चांडिल के विस्थापित अब केवल आश्वासन सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। वे हिसाब मांग रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं और अपने अधिकारों के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ने का संकल्प जता रहे हैं।

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