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संपादकीय
संपादकीय
खनिज का खजाना झारखंड का, फिर टैक्स का बोझ क्यों?
झारखंड में अक्टूबर 2024 से खनिज-युक्त भूमि पर नए टैक्स की व्यवस्था लागू हुई है। इस संपादकीय में सवाल उठाया गया है कि खनिज संपदा से बढ़ते राजस्व का लाभ आखिर खनन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों, आदिवासियों और स्थानीय युवाओं तक कितना पहुंचेगा।
14 Aug 2026 1,019
संपादकीय
सत्ता के शीर्ष पर आदिवासी, फिर भी जमीन पर आदिवासी क्यों बेहाल?
राष्ट्रपति और झारखंड के मुख्यमंत्री पद तक आदिवासी नेतृत्व पहुंचने के बावजूद गांवों में पढ़े-लिखे आदिवासी युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। युवक कंदरा किस्कू ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जमीनी बदलाव के बीच की दूरी पर तीखे सवाल उठाए हैं।
14 Aug 2026 1,276
संपादकीय
वोट मांगने वालों से पहले वोट देने वालों को तैयार कीजिए!
18 साल का युवा सिर्फ उम्र का आंकड़ा नहीं, लोकतंत्र की नई ताकत है—फिर उसके नाम मतदाता सूची में जोड़ने की प्रक्रिया इतनी औपचारिक क्यों?
11 Aug 2026 1,165
संपादकीय
नशे के खिलाफ लड़ाई में निशाना सही होना चाहिए
गांजा बरामदगी पर पुलिस की कार्रवाई स्वागतयोग्य, लेकिन असली चुनौती ब्राउन शुगर के उस जाल से है जो युवाओं का भविष्य निगल रहा है।
11 Aug 2026 1,816
संपादकीय
सिर्फ़ चर्चा नहीं, व्यवस्था बदलने की पहल भी ज़रूरी
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठे सवालों के बीच दीपांकर चक्रवर्ती ने सरकार को Citizen Policy Memorandum भेजकर परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के सुझाव दिए हैं।
04 Aug 2026 1,209
संपादकीय
नशे की गिरफ्त में समाज: अब खामोशी नहीं, जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
युवा बचेंगे तभी भविष्य बचेगा। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पर संपादकीय, जो बताता है कि यह लड़ाई केवल पुलिस या सरकार नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
04 Aug 2026 1,177
संपादकीय
जब कुर्सी लगी हिलने, तो रोज़ एक रील लगी बनने...
लोकतंत्र के इस नए डिजिटल युग में अब भाषणों से ज़्यादा रीलों का दौर है। सत्ता जब डगमगाती है तो कैमरा जनता की ओर घूमने लगता है — एक संपादकीय टिप्पणी।
03 Aug 2026 1,231
संपादकीय
जब मुकदमा ही सज़ा बन जाए…
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। जब किसी नागरिक को दोषी ठहराने से पहले ही वर्षों तक जेल में रहना पड़े, तब सवाल उठता है कि क्या न्याय समय पर मिल रहा है? UAPA और न्यायिक देरी पर एक संपादकीय टिप्पणी।
03 Aug 2026 1,235
संपादकीय
करंट जनऊ में नहीं, ज़हरीली सोच में लगता है..
"जो जनेऊ पहनता है उसे करंट नहीं लगता" — जब यह बात एक बड़े धार्मिक मंच से निकलती है, तो यह समाज की वैज्ञानिक चेतना पर सीधा आघात बन जाता है।
03 Aug 2026 1,661